संपादकीय. महात्मा गांधी की सीख थी कि शराब शरीर और आत्मा दोनों का नाश करती है। लेकिन विडंबना देखिए कि गांधी के देश में शराब का सेवन करने वाले सबसे ज्यादा हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया भर में तकरीबन दो अरब लोग इस नशे का इस्तेमाल करते हैं जिनमें से साढ़े बासठ करोड़ लोग अकेले भारत में बसते हैं।
यहां ३क् फीसदी पुरुष और ५ प्रतिशत स्त्रियां शराब की शिकार हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया के क्षेत्र में ६५ फीसदी से ज्यादा शराब का उत्पादन अकेले भारत में होता है। ताजा सर्वेक्षणों से पता चलता है कि देश में शराब पीने की उम्र १९८क् में २८ साल के मुकाबले अब घटकर १९ साल पर आ गई है और अगले ५-६ वर्षो में इसके १५ साल पर पहुंच जाने का अंदेशा है।
ऐसे में स्वास्थ्यमंत्री अंबुमणि रामदास की यह चिंता जायज लगती है कि नशाखोरी के विरुद्ध जरा सख्त कदम उठाए जाने की जरूरत है। स्वास्थ्यमंत्री पेशे से डॉक्टर भी हैं इसलिए यह अच्छी तरह जानते हैं कि शराब उद्योग से जितनी कमाई होती है, उससे ज्यादा पैसा उन स्वास्थ्य समस्याओं पर नष्ट हो जाता है, जो शराब पीने की वजह से पैदा होती हैं।
देश में लगभग चालीस प्रतिशत सड़क दुर्घटनाएं रात में और शराब पीकर गाड़ी चलाने की वजह से होती हैं। घरेलू हिंसा और सामाजिक तनाव के मामले भी यदि इसमें जोड़ दिए जाएं, तो इसके दुष्प्रभाव की स्थिति भयावह हो जाती है। लेकिन चिंता की बात यह भी है कि एक तरफ तो भारत को आने वाले समय में दुनिया के सबसे युवा देश के रूप में चिन्हित किया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर देश के युवाओं में शराब पीने की लत बढ़ती जा रही है। जाहिर है, इससे हमारी कामकाजी आबादी की कार्यक्षमता नकारात्मक रूप से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती।
पिछले दिनों धूम्रपान के विरुद्ध स्वास्थ्यमंत्री द्वारा छेड़ा गया अभियान अभी मद्धिम भी नहीं पड़ा था कि शराब को भी उन्होंने अपने एजेंडे में ले लिया। समाज के जिन ‘नायकों’ का देश की युवा पीढ़ी पर प्रभाव है, उन्हें अपने सार्वजनिक आचरण को मर्यादित ही रखना चाहिए, ताकि वे कुवृत्तियों के प्रेरक न बनें। इस संदर्भ में फिल्मों और प्रकारांतर से परोक्ष विज्ञापन के जरिए धूम्रपान और शराब को महिमामंडित करने की कोशिशों पर रोक लगनी चाहिए। आखिर अपने नागरिकों को स्वस्थ और निरोग बनाए रखने की भौतिक और नैतिक जिम्मेदारी राज्य को क्यों नहीं लेनी चाहिए।