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विरासत की हिफाजत, इधर भी उधर भी

चंडीगढ़चंडीगढ़ के क्रिएटर ली काबरूजिए के फर्नीचर की आड़ में अब गोरे यूं ही पैसा नहीं कूट पाएंगे। चंडीगढ़ में जिस फर्नीचर को बेकार और पुरानी चीज समझ कर गोदाम में फेंक दिया जाता है, उसे अभी पिछले महीने ही पेरिस और न्यू यॉर्क में 8 से 12 हजार डॉलर के बीच बेचने की कोशिश हुई है।

लकड़ी की सोने जैसी कीमत भांप लेने के बाद प्रशासन ने सभी विभागों को लिखा कि काबरूजिए के फर्नीचर का ब्यौरा तैयार किया जाए और इसे बेचा न जाए। इसका हिसाब रखने के लिए प्रशासन ने एक कमेटी भी बनाई थी, लेकिन अभी तक यह जानकारी ही इकट्ठा नहीं हो पाई कि आखिर चंडीगढ़ में काबरूजिए के वक्त का फर्नीचर है भी या नहीं। चंडीगढ़ कॉलेज ऑफ आर्किटेक्चर के प्रिंसिपल रजनीश वत्स कहते हैं, ‘अभी तक कुछ विभागों का ही जवाब आया है और ज्यादातर ने यह नहीं बताया कि उनके यहां काबरूजिए के जमाने का कितना फर्नीचर बाकी पड़ा है?’

यानी अभी भी यह कोशिश जारी है कि काबरूजिए के कामों को इकट्ठा किया जाए। चंडीगढ़ को मॉडर्न वल्र्ड हेरिटेज सिटी का दर्जा दिलवाने में जुटे डायरेक्टर टूरिज्म विवेक अत्रे कहते हैं कि काबरूजिए के फर्नीचर को संभालने के लिए अब होम सेक्रेटरी के स्तर पर एक मीटिंग होने जा रही है। इसके साथ ही यह कोशिश हो रही है कि चंडीगढ़ ही नहीं पंजाब, हरियाणा, हिमाचलप्रदेश के सरकारी दफ्तरों में भी अगर कहीं ऐसा पुराना फर्नीचर है तो उसकी जानकारी इकट्ठा की जाएगी। चंडीगढ़ के सरकारी विभागों में तो ऐसे फर्नीचर को बेचने पर रोक लगा दी गई है। हाल ही में प्रशासन ने ऐसी 18 कुर्सियों को ठीक भी करवाया है।

इस बीच जानकारों का कहना है कि पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट और पंजाब यूनिवर्सिटी से करीब 7-8 साल पहले पुराना फर्नीचर खरीदा गया था, अब शायद उसी फर्नीचर को काबरूजिए का फर्नीचर कह कर बेचा गया हो।

काबरूजिए सेंटर में रखेंगे फर्नीचर को :

सेक्टर-19 ली काबरूजिए सेंटर के नोडल ऑफिसर वी. एन. सिंह कहते हैं कि काबरूजिए के ओरिजनल कामों में लकड़ी का फर्नीचर ही ज्यादा है। इस तरह के करीब 50 आर्टिकल चंडीगढ़ म्यूजियम में हैं और इनमें से 25 काबरूजिए सेंटर में डिसप्ले किए जाएंगे। इनमें ज्यादातर अच्छी किस्म की कुर्सियां हैं।





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