जयपुर: राष्ट्रीय बागवानी मिशन के तहत अनुदान में हुए करोड़ों के घोटाले में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। किसानों को यही नहीं पता कि कीटनाशकों के नाम पर कब अनुदान मिला और कब भुगतान उठ गया। उद्यान विभाग के अधिकारियों ने लाभांवित किसानों की इंटरनेट पर जो सूची डाली है, उसमें भी किसानों के नाम-पते और तहसीलों की जानकारी तो है, लेकिन खसरा नंबर नहीं लिखे गए हैं।
भास्कर ने गांव-गांव जाकर किसानों से मामले की सत्यता का पता लगाया तो ये तथ्य सामने आए। दूसरी तरफ, खबर छपने के बाद उद्यान विभाग के अधिकारियों में खलबली मची हुई है। वे अनुदान बांटने की जिम्मेदारी क्रय-विक्रय सहकारी समितियों पर डाल रहे हैं। इस बीच गुरुवार को जयपुर लौटीं मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने इस मामले में कृषि और उद्यान विभाग के अधिकारियों से जानकारी ली और कृषि विभाग के प्रमुख सचिव आशीष बहुगुणा को पूरे प्रकरण की जांच के निर्देश दिए हैं।
उधर, घोटाले का पर्दाफाश करने वाले आईएएस अफसर आरएस गठाला ने बागवानी मिशन में व्यापक स्तर पर गड़बड़ियों की आशंका जताते हुए कहा है कि सामाजिक अंकेक्षण कराने से ही सचाई सामने आ सकती है। वे 24 मार्च 2007 को कोटा इस प्रकरण की जांच करने गए थे। वहां से 29 मार्च को जयपुर लौटते ही उन्होंने सहकारी समितियों के सहायक, उप और संयुक्त रजिस्ट्रारों तथा जिला कलेक्टरों को पत्र लिखकर पूरे मामले की जांच कराने को कहा। वे जांच की कार्यवाही कर ही रहे थे कि 5 अप्रैल के आसपास उनका तबादला कर दिया गया।
इन जिलों में थी योजना : टोंक, कोटा, बारां, झालावाड़, जालौर, जोधपुर, अजमेर, पाली, अलवर, चित्तौड़गढ़, श्रीगंगानगर, नागौर, बांसवाड़ा, सवाई माधोपुर, करौली, नागौर और बाड़मेर।
सवाई माधोपुर : किसानों को अनुदान का पता ही नहीं है। अधिकारी अब कह रहे हैं कि हम तो तैयार थे, किसानों ने ही नहीं लिया। सहायक निदेशक रामराज मीणा खंडार क्षेत्र में केवीएसएस के माध्यम से अनुदान बांटने की बात स्वीकार करते हैं।
अजमेर :1734 रुपए ही मिले: श्रीनगर के किसान खेमचंद कीटनाशकों के लिए अनुदान मिलने की बात तो स्वीकार करते हैं, लेकिन उनका कहना है कि उन्हें एक हजार रुपए मूल्य की दवाएं और 1734 रुपए ही मिले थे।
जयपुर: योजना की जानकारी तक नहीं दी: शाहपुरा के किसान कन्हैयालाल, कालूराम, सेडूराम यादव ने भास्कर टीम को बताया कि उन्हें कीटनाशकों के लिए अनुदान मिलने की योजना के बारे में ही किसी अधिकारी ने सूचना नहीं दी। उनके नाम से फर्जी अनुदान उठ गया हो तो इसकी उन्हें जानकारी नहीं है। जबकि चौमूं के किसान रिछपाल चौधरी ने 3600 रुपए के अनुदान के रूप में खाद और दवाइयां मिलने की बात स्वीकार की है।
मंत्री केवल तबादलों के लिए हैं क्या?मंत्री ही विभाग का ओवरऑल प्रभारी होता है। उसके पास तबादले करने की ही नहीं, विभागीय योजनाओं की समीक्षा और योजनाओं का लाभ नीचे तक पहुंचे यह देखने की जिम्मेदारी भी है। अनुदान का सही वितरण हो रहा है या नहीं यह देखने के लिए विभाग में फील्ड कर्मचारियों से लेकर निदेशक तक की चेन है। शासन सचिव का काम तो केवल नीतिगत फैसलों तक ही है। -आर.एस. गठाला, पूर्व उद्यान सचिव
अधिकारियों को सीधे चिट्ठी लिखने का क्या औचित्य: उद्यान सचिव की चिट्ठी पर जांच नहीं कराए जाने के बारे में पूछे जाने पर सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार सुधांश पंत ने कहा कि यदि किसी तरह की गड़बड़ी थी, तो विभाग को पत्र लिखना चाहिए था। नीचे के अधिकारियों को सीधे पत्र लिखने का क्या औचित्य है ?
कोटा से रिकॉर्ड तलबउद्यान निदेशालय ने बागवानी मिशन के तहत अनुदान राशि में हुए घोटाले को देखते हुए कोटा कार्यालय का रिकॉर्ड तलब किया है। नयापुरा में उद्यान विभाग के अधिकारी दिनभर रिकॉर्ड खंगालते रहे। यहां किसानों को एक करोड़ 23 लाख 7 हजार रुपए का अनुदान बांटा गया है। अमरपुरा, रीछाहेड़ी और पालाहेड़ा के दो-तीन किसानों ने ही अनुदान मिलने की बात स्वीकार की है।
बाड़मेर : फर्जी हस्ताक्षरों से उठा भुगतान-कवास के किसान चिमनाराम माली ने कहा उसके खेत में ट्यूबवैल ही नहीं है जिससे वह जीरे की बुआई करता। उसे किसी तरह का अनुदान नहीं मिला है। कृषि विभाग वालों ने फर्जी दस्तखतों से भुगतान उठा लिया। लीलसर के गुमनाराम चौधरी, साजीतड़ा के कैलाशसिंह और गोपालसिंह ने बताया कि कृषि विभाग में जमा आवेदन पर उनके दस्तखत नहीं हैं। इस मामले की गहन जांच होनी चाहिए।
सैनी के कार्यकाल का तीसरा बड़ा मामला: राजनीतिक हलकों में भी इस बात को लेकर खासी चर्चा थी कि कृषि मंत्री प्रभुलाल सैनी के कार्यकाल में यह तीसरा बड़ा मामला उजागर हुआ है।
सबसे पहले उनके पुत्र द्वारा कंपनी बनाकर लोगों को ठगने, इसके बाद पशुधन सहायकों की भर्ती में गड़बड़ियां और अब कीटनाशकों के नाम पर अनुदान उठाने का मामला। तीनों ही मामलों को जांच के नाम पर दबा दिया गया।