HomeVichaar Vichaar

खाद्यान्न की कमी पर चिंता

भूमंडलीकरण की एक खूबी यह है कि दुनिया में कहीं भी होने वाली अच्छी और बुरी चीजों का असर जल्दी ही दूसरे हिस्सों पर भी महसूस किया जाने लगता है। यही वजह है कि खाद्यान्न संकट और भुखमरी से जूझ रहे अफ्रीका, एशिया और लातिन अमेरिकी देशों की कराह अब समृद्ध और विकसित देशों की भी नींद उड़ा रही है।

वहां के अखबारों में अपने नागरिकों को यह सुझाव दिया जा रहा है कि तेजी से बढ़ रही खाद्यान्न कीमतों के मद्देनजर खाने-पीने की बुनियादी चीजों का भरपूर स्टॉक जमा कर लिया जाए, लेकिन इन्हीं देशों के हुक्मरान बाकी देशों को यह नैतिक हिदायत देते घूम रहे हैं कि भुखमरी के ‘मानवीय संकट’ को देखते हुए उन्हें अपने खाद्यान्न निर्यातों को सीमित या प्रतिबंधित नहीं करना चाहिए।

अमेरिकी विदेशमंत्री कोंडालिजा राइज तो हमारी थाली में भी ताक-झांक करती नजर आ रही हैं। उनका मानना है कि दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था और प्रमुख खाद्यान्न निर्यातक भारत और चीन का विशाल मध्यवर्ग भोजन का उपभोग ज्यादा करने लगा है इसलिए दुनिया में खाद्यान्न संकट पैदा हो गया है। जबकि राइज यह भूल जाती हैं कि भारत और चीन के मध्यवर्ग का दायरा बेशक बड़ा हो गया है लेकिन वहां आज भी गरीबी और भुखमरी में जीने वाली एक बड़ी आबादी रहती है। भारत में तकरीबन बीस प्रतिशत और चीन में पंद्रह प्रतिशत ऐसे अभागे बसते हैं जिन्हें दो वक्त का भरपेट भोजन मयस्सर नहीं होता। इसलिए सवाल यह है कि यहां की हुकूमतें पहले अपने नागरिकों का पेट भरें या फिर विकसित देशों के लिए खाद्यान्नों का अबाध निर्यात सुनिश्चित करें।

सच यह है कि अमेरिका और यूरोपीय देश आजकल बड़े पैमाने पर अपने खाद्यान्नों का उपयोग बायरेईधन बनाने में कर रहे हैं, ताकि तेल की बढ़ती कीमतों से निपटा जाए। इसे संयुक्त राष्ट्र ने बुनियादी मानवीय जरूरतों के संदर्भ में एक ‘आपराधिक रास्ता’ करार दिया है। इसलिए विकसित देशों की नसीहत का कोई नैतिक औचित्य नहीं है। फिर भी यह चिंताजनक है कि खाद्यान्नों की लगभग 122 प्रतिशत बढ़ी हुई कीमतें दुनिया के गरीबों के लिए ही सबसे ज्यादा मारक सिद्ध होंगी।

जहां दुनिया की आधी आबादी दो डॉलर से भी कम पर प्रतिदिन गुजारा करती हो और अमीरों के एक प्रतिशत हिस्से की कमाई गरीबों के 57 प्रतिशत हिस्से की आमदनी से भी ज्यादा हो, वहां भूख का हाहाकार सबसे ज्यादा गरीबों के देश में ही गूंजेगा। इनके बारे में सोचना और चिंता करना समूची मानव जाति की जिम्मेदारी है, लेकिन सबसे ज्यादा जवाबदेही उन देशों की है, जो दुनिया की असमानता से फायदा उठाते हैं और अधिकांश संसाधनों पर काबिज रहते हैं।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: