एक अप्रैल 2008 को पूरे भारत में एक ऐसा महत्वाकांक्षी एवं ऐतिहासिक कानून लागू हुआ, जिसके तहत ग्रामीण भारत के वयस्क मजदूर जो शारीरिक श्रम कर सकते हैं, अपनी ग्राम पंचायत में जाकर काम की मांग कर सकते हैं। कोई वयस्क यदि काम मांगे और उसे 15 दिन में काम नहीं मिले, तो वह बेरोजगारी भत्ते का हकदार होगा। इसके लिए जरूरी है सबसे पहले जॉब कार्ड बनवाना, उसके बाद काम की अर्जी देना तथा अर्जी की रसीद लेना।
यही सबसे महत्वपूर्ण और बुनियादी कार्य है, राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम का। मगर राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून की असली मंशा के अनुरूप रोजगार की वास्तविक गारंटी कितनी प्राप्त हो पा रही है, यह चिंता और चिंतन दोनों का विषय है।
दुनिया में कहीं भी किसी भी देश की सरकार ने ऐसी जिम्मेदारी नहीं ली, जैसी रोजगार गारंटी कानून बनाकर भारत की सरकार ने ली है, इसलिए दुनिया भर में इसे सराहनीय पहल माना जा रहा है। एक मोटे अंदाज के मुताबिक अब जबकि रोजगार गारंटी योजना पूरे देश में लागू हो गई है, देशभर में एक दिन ऐसा होगा जब एक करोड़ लोग एक साथ काम कर रहे होंगे। ऐसा नजारा पूरी दुनिया में पहली बार दिखेगा, जब एक ही कार्यक्रम में इतनी विशाल संख्या में लोग कामों पर नियोजित किए जाएंगे।
यदि इस देश के राजनेताओं और सरकारी तंत्र में इच्छाशक्ति और प्रतिबद्धता हो और वे रोजगार गारंटी को वास्तव में लागू करें, तो अंतिम व्यक्ति के घर में इससे अनाज पहुंच सकता है, उसकी भूख को समाप्त किया जा सकता है। ग्रामीण भारत में विकास के स्थायी ढांचे विकसित हो सकते हैं। रोजगार सृजन हो सकता है, पेड़ उग सकते हैं, सड़कें बन सकती हैं और खेतों में सुधार हो सकता है।
रोजगार गारंटी की आलोचना में अक्सर कहा जाता है कि यह मात्र मिट्टी खुदाई का काम है, लेकिन अनुभव बताते हैं कि कच्चे और पक्के काम करते हुए भी बहुत सुंदर तरीके से भारत विकसित हो सकता है। इस स्थिति तक पहुंचने के लिए बहुत जरूरी है कि चुस्त, पारदर्शी और जवाबदेही वाली व्यवस्था रोजगार गारंटी योजना को पूरे मन से लागू करें। अपनी लोकप्रियता की वजह से रोजगार गारंटी कानून संसद में पास तो हो गया है, लेकिन विगत दो वर्षो में जिस प्रकार से इस योजना का क्रियान्वयन हुआ है, उसने साबित किया है कि राज्य सरकारों और प्रशासनिक तंत्र की उदासीनता के चलते इसकी आत्मा को ही खत्म करने का षड्यंत्र रचा जा रहा है।
स्पष्ट दिशा-निर्देशों तथा पर्याप्त बजट होने के बावजूद स्टाफ की नियुक्ति नहीं करना और पूरी व्यवस्था नहीं बिठाना स्पष्ट करता है कि कहीं न कहीं रोजगार गारंटी को लागू करने में राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है।
राजस्थान जिसे रोजगार गारंटी योजना के क्रियान्वयन में अव्वल दर्जा दिया जाता है, वहां भी कई जिलों में 1 अप्रैल को काम शुरू नहीं हो सके। योजना के लागू हो जाने तक लोगों के जॉब कार्ड नहीं बनाए गए। 31 मार्च को राजस्थान के राजसमंद जिले की भीम पंचायत समिति के बाहर सैकड़ों मजदूरों की एक सभा हुई, जिसमें पता चला कि अभी तक किसी भी व्यक्ति को जॉब कार्ड नहीं मिला है। बाद में पता चला कि भीम की 31 ग्राम पंचायतों में केवल 10 ग्राम सचिव कार्यरत हैं, बाकी पद रिक्त हैं। यदि इस योजना का भीम जैसे जागरूक क्षेत्र में यह हश्र है, तो राजस्थान और देश के बाकी हिस्से में क्या हाल होगा, इसे आसानी से समझा जा सकता है।
संभवत: स्टाफ की कमी के बहाने इस योजना को विफल बनाने की कोशिश भी की जा रही है। अन्यथा तो साफ तौर पर कानून कहता है कि हर ग्राम पंचायत में इस योजना के सफल क्रियान्वयन के लिए एक अलग कर्मचारी लगना चाहिए, जिसको ‘ग्राम रोजगार सेवक’ कहा जाएगा।
व्यवस्था की कमी के अलावा भ्रष्टाचार को भी रोजगार गारंटी योजना के लिए बहुत बड़ा खतरा माना जा रहा है। राजस्थान, उड़ीसा, उत्तरप्रदेश, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश तथा महाराष्ट्र आदि राज्यों के जनसंगठनों व सरकारों ने सामाजिक अंकेक्षण के जरिए कई खट्टे-मीठे सुझाव प्राप्त किए हैं। जहां राजनीतिक इच्छाशक्ति थी, वहां कार्यवाहियां भी हुई हैं और अनियमितता करने वालों से पैसे भी वापस लिए गए हैं। आंध्रप्रदेश में तो यहां तक हुआ कि सामाजिक अंकेक्षणों के दौरान खुली सभाओं में अब तक एक करोड़ रुपए वसूले जाकर वास्तविक हकदारों के पास पहुंचाए गए हैं।
अब जनता ही इस कानून को संरक्षित करेगी क्योंकि वास्तव में सूचना का अधिकार और रोजगार गारंटी, दोनों ही जनता के कानून हैं जिन्हें जनता ने अपने लिए बनवाया है। इनकी रक्षा के लिए भी जनता को ही उठ खड़ा होना होगा। नागरिकों को अब पंचायतों के सामने जाकर बैठना होगा और कहना होगा कि हमें जॉब कार्ड दो, काम के आवेदन पत्र उपलब्ध कराओ, आवेदन पत्र लो और उसकी तारीख सहित रसीद दो।
इतना ही नहीं, बल्कि काम खोलकर काम भी दो। देश भर से लाखों की तादाद में ग्रामीणों को एक ‘काम मांगो अभियान’ छेड़ना होगा। साथ ही साथ यह भी समझना होगा कि यह एक राजनीतिक मुद्दा है और इसका मजबूत राजनीतिक जवाब मजदूर यूनियन के रूप में संगठित होकर ही दिया जा सकेगा ताकि राजनीतिक हलकों में स्पष्ट संदेश जाए कि काम के इच्छुक लोगों की आवाज नहीं सुनी गई, तो राजनीतिक दलों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
वैसे भी अब तो चुनाव निकट हैं, इसलिए सारे राजनीतिक दलों में रोजगार गारंटी कानून का श्रेय लेने के लिए होड़ सी मची है। किंतु इन राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि उन्हें श्रेय तो तब मिलता जब उनके कार्यकर्ता गांवों में निकलते, लोगों के जॉब कार्ड बनवाते, उन्हें काम दिलाते तथा उनकी न्यूनतम मजदूरी के लिए संघर्ष करते। अब जरूरत इस बात की है कि गरीबों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण रोजगार गारंटी को सरकारी तंत्र की उदासीनता और राजनीतिक दलों की हवाई बातों के छलावे से बचाया जाए तथा वास्तविक एवं ईमानदार प्रयासों से इसे पूर्णत: लागू किया जाए, तभी ग्रामीण भारत की तस्वीर बदल सकती है।
-लेखक द्वय मजदूर किसान शक्ति संगठन के कार्यकर्ता हैं और अरुणा रॉय केंद्रीय रोजगार गारंटी परिषद की सदस्य हैं।