आजादी के बाद कुछ कलाओं ने बहुत उन्नति की है। इनमें सार्वजनिक झूठ बोलने की कला, जिसे भाषण भी कहते हैं या मंच पर अभिनय के साथ कविता पढ़ने की कला भी शामिल है। यह देश का दुर्भाग्य है कि ऐसी कलाएं अभी शहरों, जिलों, कस्बों तक ही सीमित हैं। गांव-गांव यह लोकप्रिय नहीं हुई है। जीवन से धीरे-धीरे लोक कलाएं जैसे लोक गीत आदि लुप्त हो रहे हैं। रेडियो हो या टीवी सब पर ‘रीमिक्स’ का जलवा है। कुदरत का कानून है। शून्य को तो भरना ही भरना है। अदृश्य होती इन कलाओं के युग में एक कला ने देशव्यापी ख्याति अर्जित की है। यह है डंडी मारने की कला।
गांव का हाट मेला हो या शहर का व्यस्त बाजार, इसके कलाकार हर जगह पाए जाते हैं। कल हमने देखा कि एक दुकान पर दर्ज था- ‘धर्म-कांटा’। ‘धर्मकांटा’ लिखा देखकर अचानक अपने पांव भी ठिठक गए। यह कौन सा कांटा है? क्या यह धर्मराज युधिष्ठिर के जमाने की तराजू का तवारीखी अवशेष है? हमने उनके वफादार कुत्ते का तो सुना था जिसे वह अपने साथ स्वर्ग ले गए थे। धर्म-कांटा क्या कोई नई ऐतिहासिक खोज है? कहीं किसी ने ‘कांटा लगा’ जैसे लोकप्रिय गाने पर अपनी तराजू का नामकरण तो नहीं कर दिया है?
हम अपनी मंजिल भूलकर धर्म-कांटे की ओर चल पड़े। ‘कहो जी क्या तुलवाना है’ दुकान वाले ने बेरुखी से हमें देखा। यह ‘धर्म-कांटा’ क्या बला है? हमने जानना चाहा। उसने बताया कि यह ईमानदारी की तराजू है। इसमें कोई गड़बड़-घोटाला नहीं है। हमारी गारंटी है कि इसके बाट सही हैं। पलड़े बराबर हैं। हमने चलते-चलते टिप्पणी की कि क्या दूसरे ‘अधर्म कांटे’ हैं? अब तक हम उसके लिए ग्राहक से प्रश्नवाचक चिन्ह बना चुके थे। उसने और बेरुखी में जवाब दिया, ‘तू जो चाहे समझ ले।’
अपने और कुछ समझ आया न आया, इतना जरूर पल्ले पड़ा कि जब तक हम एक किलो आलू लेते हैं तो एकाध पाव का हेरफेर तो होता ही है। एक बार मन में शक का कीड़ा रेंग गया, तो उसका इलाज न लुकमान के पास है, न धनवंतरि के पास। हमने एकाध बार दुकानदार की तराजू ‘चैक’ करने की कोशिश की, तो झगड़ा होते-होते बचा। उसने हमें झिड़क दिया- ‘खरीदनी है तो खरीदो नहीं तो आगे बढ़ चलो। चले आते हैं पंगा करने दुकानदारी के वक्त। जैसे ग्राहक न होकर सरकार के इंस्पेक्टर हों।’ वह तो दूसरों ने बीच बचाव किया वरना अपनी पिटाई की नौबत आ गई थी। हमें पहले सिर्फ शक था, अब यकीन है कि पूरा बाजार डंडी मारता है।
हमें ताज्जुब भी होता है। एक दिन में इस सब्जी बाजार से हजारों व्यक्ति खरीददारी करते रहे हैं। क्या ये दुकानदार डंडी मारने की कला के ऐसे विशेषज्ञ हैं कि कोई माई का लाल इस नाइंसाफी के खिलाफ चूं तक नहीं करता है। उल्टे, माल-तौल में पांच-दस पैसे की रियायत पाकर वह ऐसे प्रफुल्ल्ति होते हैं कि सौदेबाजी का किला फतह कर लिया। उन्हें कौन बताए कि हर हाल में विजेता डंडी मार है।
अब तो हमें यकीन हो चला है। सबसे बड़ा डंडीमार मुल्क का वित्तमंत्री है। दूसरे तो इस महान कलाकार के सामने पानी भरते हैं। उसने कर मुक्त आय की सीमा बढ़ाकर पढ़ी-लिखी जनता का मन मोह लिया, तो दूसरी तरफ अन्य वस्तुओं पर कर का दायरा बढ़ाकर खजाना भी भर लिया। इसे कहते हैं इस हाथ एक दे, उस हाथ दो ले।
-लेखक वरिष्ठ व्यंग्यकार हैं।