विश्व प्रेस दिवसआज 3 मई दुनिया भर में विश्व प्रेस स्वातं˜य दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष वल्र्ड एसोसिएशन ऑफ न्यूजपेपर्स ने इस दिन को चीन में प्रेस की आजादी को समर्पित किया है। यहां ध्यान देने योग्य है कि तीस से ज्यादा पत्रकार और इंटरनेट पर असहमति जताने वाले लगभग 50 लेखक चीन में सलाखों के पीछे हैं, जो पूरी दुनिया में गिरफ्तार पत्रकारों की सबसे बड़ी संख्या है।
ऐसी उम्मीद की जाती है कि आगामी ओलिंपिक खेलों में दुनिया भर के पत्रकार चीन पहुंचेंगे तब इस समस्या की ओर ध्यान आकर्षित करने में सहायता मिलेगी। चीन के कई जाने माने पत्रकारों का मानना है कि स्थितियां बदलनी शुरू हो गई हैं। हालांकि प्रेस की आजादी हासिल करने में अभी वक्त लगेगा।
चीन के अखबार चाइना यूथ डेली में रिपोर्टर और बाद में संपादक के तौर पर 27 वर्षो तक काम करने वाले ली दतोंग को 1989 में नौकरी से निकाल दिया गया, जब उन्होंने बीजिंग में एक हजार से ज्यादा रिपोर्टरों के साथ चीन की प्रेस में सुधार को लेकर रैली निकाली। वर्ष 1995 में बहाल होने के बाद उन्होंने बिंग दियान (फ्रीजिंग प्वाइंट) नाम से एक साप्ताहिक निकाला, जिसमें उन्होंने कई अनछुए विषयों पर लिखा। जनवरी 2006 के अंत में इस साप्ताहिक को भी बंद कर दिया गया। ली को नौकरी से निकाल दिया गया और उनके संपादक के तौर पर काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया।
ली के अनुसार 1949 में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार बनने के बाद से प्रबुद्ध लोगों और कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर अभिव्यक्ति स्वातं˜य समाप्त हो गया। पर 1978 में पश्चिम के दबाव में चीन को अपने समाज को खोलने पर मजबूर होना पड़ा और आज वहां के पत्रकार अपने को पार्टी का मुखपत्र न मानकर, आज की घटनाओं का सही ब्योरा लिखना चाहते हैं। यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इसकी वजह से कई बार पार्टी तंत्र के साथ मुखालफत की नौबत आती रहती है। इंटरनेट के बढ़ते प्रयोग ने सूचना के आदान-प्रदान को एक नई तेजी दी है। आज पत्रकार अपनी खबरों में कहीं ज्यादा सचाई को जगह देते हैं और अब कहीं ज्यादा संख्या में आलोचनात्मक टिप्पणियां दिखती हैं।
अखबारों और किताबों के बंद होने या प्रतिबंधित होने पर विरोध होता है और इन सभी की वजह से पार्टी को सूचना की आजादी को बनाए रखने के लिए नए कदम उठाने पर मजबूर होना पड़ा है। ली को पूरा विश्वास है कि अगले 20 सालों में चीन में आधारभूत सुधार होंगे और प्रेस की पूरी आजादी फलीभूत होगी। वे जो यह लड़ाई लड़ रहे हैं, उनके लिए यह एक लंबा समय हो सकता है, पर इतिहास के लिए यह केवल एक क्षण है।
कुछ ऐसी ही राय है ली प्यु की, जो चीन की शिन्हुआ न्यूज एजेंसी के उप प्रमुख थे। फरवरी 2006 में उन्होंने सूचना की आजादी के लिए सेवानिवृत्त अधिकारियों और शिक्षाविदों को इकट्ठा किया। उनके अनुसार संचार माध्यमों और ऑन लाइन मीडिया के विकास से सूचना का आदान-प्रदान आसान हुआ है। अब खबरों को छिपा के रखना आसान नहीं। हालांकि सत्ता में बैठे लोग उत्पीड़न की किसी भी हद तक जा सकते हैं। वे लोगों को बर्खास्त कर सकते हैं, गिरफ्तार कर सकते हैं, जेल में डाल सकते हैं या चोरी-छिपे उन्हें मौत की सजा भी दे सकते हैं। फिर भी, अब ऐसा करना कठिन होता जा रहा है, हालांकि पूरी तरह से बंद नहीं हुआ है। उनके हिसाब से अभी हालात बदलने और ठीक होने में बहुत समय लगेगा।