भोपाल वित्त मंत्री पी चिदंबरम संसद में जिस स्टील उद्योग को महंगाई के लिए सबसे ज्यादा (21.3 फीसदी) जिम्मेदार बता रहे थे, उसमें कीमतें दोगुनी करने का दोषी कौन था? आप आम आदमी के इस्तेमाल में आने वाले सरिया, वायर रॉड और वायर जैसे उत्पादों की कीमतों पर गौर करें तो समझ जाएंगे कि सरकार को आम आदमी की कितनी चिंता है।
कृत्रिम तेजी का प्लेटफार्म
स्टील के बाजार में 22 नवबंर से 7 दिसंबर के दौरान कीमतें करीब 27-28 रुपए प्रति किग्रा चल रही थीं। सरकारी क्षेत्र की प्रमुख उत्पादक सेल ने जनवरी में अपने ग्राहक उद्योगों को संदेश भेजना शुरू कर दिया कि कोयले की कीमतें व अन्य कच्चे माल की लागत बढ़ने के कारण वह माइल्ड स्टील का उत्पादन घटाने वाली है। उधर, राष्ट्रीय इस्पात निगम ने लौह अयस्क की कीमतें बढ़ने का हवाला देते हुए वायर रॉड जैसे उत्पादों का उत्पादन घटाना शुरू कर दिया।
आम आदमी पर मार
साधारण उपभोक्ता वायर, वायर रॉड व सरिया जैसे उत्पादों का इस्तेमाल करता है। सेल व राष्ट्रीय इस्पात निगम मिलकर करीब 18 लाख टन सालाना वायर रॉड बनाते हैं, जबकि घरेलू बाजार में मांग 36 लाख टन वायर रॉड की होती है। फरवरी और मार्च के दौरान सेल और राष्ट्रीय इस्पात निगम ने बाजार में वायर रॉड और सरिया की आपूर्ति एकदम घटा दी। जबर्दस्त अभाव के कारण अप्रैल के पहले सप्ताह में वायर की कीमतें 53 रुपए प्रति किग्रा और सरिया की कीमतें 47 रुपए प्रति किग्रा तक जा पहुंची। नतीजा यह हुआ कि छोटे उपभोक्ता पर 20 रुपए प्रति किग्रा की सीधी मार पड़ी।
कच्चे माल का तर्क:
>> कारोबारियों का कहना है कि जहां शीट, स्लैब्स, हैवी स्ट्रक्चर्स जैसे उत्पादों पर प्रति किग्रा केवल 8-10 रुपए का इजाफा हुआ, जिनका इस्तेमाल आम उपभोक्ता नहीं करता है। क्या उनके लिए कच्च माल अलग-अलग था?
>> अगर 5 अप्रैल से देखा जाए तो सरिया व वायर में प्रति किग्रा 10-12 रुपए की गिरावट आ चुकी है। अगर कच्चे माल की लागत बढ़ गई है, तो क्या वह अब घट गई है?
करार वालों को फायदा:
यह नुकसान केवल छोटे ग्राहक को हुआ है। सेल व राष्ट्रीय इस्पात निगम ने जिन री रोलर्स के साथ करार कर रखे थे, उन्हें कच्चे माल की आपूर्ति जारी रखी। लेकिन बाजार में पैदा हुए अभाव के कारण साधारण उपभोक्ता से जबर्दस्त मुनाफे कमाए गए।