मई 2004 में आम चुनाव होने से तीन माह पहले दिल्ली के दो व्यापारियों और एक शेयर दलाल ने ‘राजनीतिक’ पार्टी बनाने का निर्णय किया। उन्होंने नाम और चुनाव चिह्न् का चयन किया तथा उन्हें निर्वाचन आयोग में भारत के एक गैर मान्यता प्राप्त दल के रूप में पंजीकृत करा लिया। पंजीकरण के बाद इस पार्टी ने स्वैच्छिक दान (आयकर से पूरी तरह मुक्त) लेना शुरू कर दिया। भले ही पार्टी की विचारधारा और समर्थन का आधार ‘गुप्त’ रहा हो, एक बात साफ रही, इन तीनों संस्थापकों ने कम से कम एक करोड़ रुपए पर आयकर बचा लिया। पंजीकरण के बाद ‘परमार्थ पार्टी’ ने 2004 के आम चुनाव में दिल्ली के निर्वाचन क्षेत्र सदर से केवल एक उम्मीदवार उतारा था। ब्रेड इसका चुनाव चिह्न् था। पार्टी के उम्मीदवार प्रमोद तिवारी को महज 126 वोट मिले और उसकी जमानत जब्त हो गई। निर्वाचन आयोग में पंजीकृत किसी भी पार्टी को मिले राजनीतिक दान पर किसी प्रकार का कर नहीं देना पड़ता है।
भले ही ऐसी पार्टी गैर मान्यता प्राप्त हो। व्यक्तिगत दानदाता या फर्में भी दान पर आयकर से मुक्ति पा सकती हैं।आधिकारिक रूप से उत्तरी दिल्ली के ई-ब्लॉक, कमला नगर में स्थित परमार्थ पार्टी के मुख्यालय का अस्तित्व महज कागजों पर है। पड़ताल में पता चला कि चार्टर्ड एकाउंटेंट व शेयर दलाल एसबी गुप्ता ने 2004 में डेढ़ लाख रुपए का दान किया था। गुप्ता के मुताबिक, परमार्थ पार्टी का नया नाम मातृ भक्ति पार्टी है।
अपने नए अवतार में इसने दिल्ली के म्युनिसिपल चुनाव में तीन उम्मीदवार उतारे थे, जो बुरी तरह हार गए। गुप्ता ने इस नए नाम वाली पार्टी के मौजूदा अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों के बारे में कोई भी सूचना देने से इनकार कर दिया। इस पार्टी के दो अन्य बड़े दानदाताओं पवेल गर्ग और तेजबीर सिंह ने बातचीत करने से इनकार कर दिया तथा टेलीफोन कॉलों का भी जवाब नहीं दिया।