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गुरुकुल में सियासत सीख रहे हैं ‘युवराज’

भोपालकांग्रेस के ‘युवराज’ राहुल गांधी इन दिनों गैर सरकारी संगठनों की शरण में हैं जिनके जरिये वे देश-दर्शन करते हुए राजनीति का व्याकरण सीख रहे हैं। प्रशिक्षण यात्राओं से उनकी पार्टी के नेताओं को दूर रखा जा रहा है।

राहुल गांधी ने 26 से 28 अप्रैल तक मध्यप्रदेश के झाबुआ, डिंडोरी और होशंगाबाद जिलों की यात्राएं की और एनजीओ के प्रतिनिधियों व ग्रामीणों के साथ विभिन्न मसलों पर गहन चर्चा की। इस दौरान उन्होंने कोई टिप्पणी किए बिना सबके शिकवों-शिकायतों को गौर से सुना। ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (एनआरईजीएस) और वनाधिकार अधिनियम को लेकर आइरे शिकायतों के जवाब में उन्होंने दिल्ली में बैठकर विचार-विमर्श करने का वायदा भी किया। राहुल का खास निर्देश था कि इस चर्चाओं से राजनीतिक लोगों को दूर रखा जाए।

इसीलिए जब डिंडोरी जिले के चाड़ा में चार-पांच हजार आदिवासियों की सभा आयोजित की गई तो उसे केवल राहुल ने ही संबोधित किया। झाबुआ जिले में रायपुरिया के निकट स्थित एनजीओ ‘संपर्क ग्राम’ के दौरे के दौरान भी संस्था के परिसर में उनके आने के बाद किसी नेता को घुसने नहीं दिया गया। ‘संपर्क ग्राम’ के निदेशक नीलेश देसाई बताते हैं कि इस वजह से नेताओं ने अपनी नाराजगी भी दर्ज करवाई, लेकिन इसके बावजूद राहुल ने उनसे मिलने के बजाय डॉक्टरों, इंजीनियरों और रात्रि पाठशालाओं के शिक्षकों से बातचीत करना अधिक उचित समझा। ..शेष पेज 6 पर

वैसे प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुरेश पचौरी नहीं मानते हैं कि राहुल गांधी की ये यात्राएं सिर्फ गैर सरकारी संगठनों तक ही सीमित रहीं। उनके मुताबिक इस दौरान उन्होंने कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं से भी मुलाकात की।

होशंगाबाद के सुखतवा क्षेत्र में कार्यरत एनजीओ ‘प्रदान’ द्वारा आबादीपुरा गांव में संचालित स्वयं सहायता समूह की सदस्य प्रमिलाबाई से मिलने के पूर्व राहुल ने इलाके में सक्रिय करीब 25 एनजीओ प्रतिनिधियों से चर्चा की। चारटेकरा गांव में हुई इस बैठक में एनआरईजीएस, सूचना का अधिकार अधिनियम और वनाधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन पर विस्तार से बातचीत हुई। खास बात यह रही कि एक घाघ राजनेता के विपरीत उन्होंने राज्य सरकार पर टिप्पणी करने के बजाय स्थिति को समझने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई।

सवाल यह है कि विशेषज्ञ राहुल गांधी के इस नए दर्शन को किस तरह से देखते हैं। अहमदाबाद स्थित धीरूभाई अंबानी इंस्टीट्यूट ऑफ इंफार्मेशन एण्ड कम्युनिकेशन के समाज विज्ञानी शिव विश्वनाथन कहते हैं कि राहुल राजनीति के व्याकरण को साम्राज्य से लोकतंत्र की ओर तब्दील करने की कोशिश कर रहे हैं। आज की पीढ़ी के लिए विरासत ही सब कुछ नहीं है। वह खुद भी ब्रांड बनना चाहती है। राहुल गांव-गांव घूम रहे हैं, गरीबों के साथ खा रहे हैं, उनके साथ रह रहे हैं। राहुल मानते हैं कि जब तक वे आम लोगों के जीवन में रच-बस नहीं जाते, उन्हें कोई राजनेता नहीं मानेगा।

हालांकि इसके उलट राजनीतिक विश्लेषक योगेन्द्र यादव का कहना है कि एनजीओ के जरिये देश को समझने की राहुल गांधी की कोशिश बताती है कि देश का राजनीतिक तंत्र खासकरके कांग्रेस पार्टी कितनी पंगु हो चुकी है। इन यात्राओं से एनजीओ के प्रति लगाव के बजाय कांग्रेस के प्रति निराशा ही अधिक झलकती है। इस देश दर्शन से भविष्य में दो बातें हो सकती हैं। या तो राहुल अपने पिता की तरह जवानी के आदर्श को तिलांजलि देकर व्यवस्था का अंग बन जाएंगे या फिर एनजीओ की सीमाएं समझते हुए गैर दलीय जनांदोलनों, जनसंगठनों से नाता जोड़ लेंगे।

‘‘राहुल गांधी जमीनी स्थितियों को समझने के लिए गैर-राजनीतिक यात्राएं कर रहे हैं। इलाके की समस्याओं पर बातचीत के लिए उन्होंने दिल्ली में बैठक करने का वायदा भी किया है।’’

- अनिल, एकता परिषद, डिंडोरी।

‘‘उनमें वास्तविकता को समझने की ललक दिखाई दी। आम लोगों से सीधे मिलने के लिए आयोजित यह दौरा उनके राजनीतिक प्रशिक्षण का हिस्सा ज्यादा था।’’

-नीलेश देसाई, संपर्क ग्राम, रायपुरिया (झाबुआ)।

‘‘यात्रा के राजनीतिक नतीजे हो सकते हैं, लेकिन इससे राजनेताओं को दूर रखकर उन्होंने साफ कर दिया है कि वे राजनीति के तामझाम के बिना समाज के निचले तबके की जिंदगी समझना चाहते हैं।’’

-अमजद, टीम लीडर, प्रदान, सुखतवा (होशंगाबाद)।





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rajendra
Monday, 5th May 2008, 0:48
congress party bilkul pangu ho gae hai jo congress janta ke saath hoti thi aaj ek leader ko taras rahi hai