HomeNewsMetrosBhopal Bhopal

बधाई! चैन से लें गहरी सांस

भोपालशहर के नागरिक चैन से गहरी सांस ले सकते हैं। भोपाल की आबोहवा दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों से तो बेहतर है ही। इसने जयपुर, इंदौर, लखनऊ और गवालियर जैसे शहरों को भी पीछे छोड़ दिया है। यहां तक कि उच्जैन जैसे छोटे और शांत शहर की तुलना में भी भोपाल की हवा सांस लेने के लिए बेहतर है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक भोपाल की हवा में सांस के साथ शरीर के भीतर प्रवेश कर जाने वाले (रेस्पायरेबल सस्पेंडेंड पार्टिकुलेट मैटर, आरएसपीएम) प्रदूषक कणों की मात्रा 132 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर है। यह 60 के मानक स्तर से तो ज्यादा है, लेकिन उज्जैन (136), जयपुर व जबलपुर (140), इंदौर (144), दिल्ली (195), मुंबई (165), गवालियर (202) और लखनऊ (213) से कम है। इसी तरह भोपाल की हवा में एक अन्य प्रदूषक सल्फर डाई ऑक्साइड की मात्रा महज 2.1 माइक्रोग्राम घनमीटर है, जबकि जयपुर में यह 4.9, उज्जैन में 7.8, इंदौर में 13.9, गवालियर में 8.7, दिल्ली में 7.5 और मुंबई में बहुत ज्यादा 17 है।

एक तीसरे मानक पर हालांकि भोपाल कुछ अन्य शहरों से थोड़ा पिछड़ गया है। यहां की हवा में बड़े प्रदूषक कण, जो सांस के साथ शरीर में तो प्रवेश नहीं करते लेकिन एलर्जी पैदा कर सकते हैं (सस्पेंडेड पार्टिकुलेट मैटर, एसपीएम), 355 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर हैं। ये दिल्ली (460), लखनऊ (445) और अहमदाबाद (368) से तो कम हैं, लेकिन उज्जैन (180), जयपुर (272), इंदौर (248), गवालियर (330) और मुंबई (340) से ज्यादा हैं।

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड नेशनल एयर क्वालिटी मॉनीटरिंग प्रोग्राम के तहत 72 शहरों की हवा की नियमिय जांच कर रहा है। एक साल के औसत आंकड़ों के आधार पर बोर्ड ने यह रिपोर्ट तैयार की है। मोतीलाल साइंस कॉलेज में वनस्पति शास्त्र के प्रोफेसर डॉ संतोष भार्गव कहते हैं, पेड़-पौधे की पत्तियां धूल कणों को कैप्चर कर लेती हैं जिससे जनजीवन पर उनका दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है। हरियाली के कारण ही भोपाल में ऑक्सीजन और कार्बन डाई ऑक्साइड का संतुलन बेहतर बना हुआ है।

रिपोर्ट के मुताबिक हालांकि भोपाल में प्रदूषण की सबसे बड़ी वजह वाहन ही हैं, लेकिन गाड़ियों का अनुपात भी यहां दूसरे शहरों से कम है। शहर में प्रति हजार आबादी पर 258 वाहन हैं, जबकि तेजी से महानगर की शक्ल अख्तियार करते जा रहे इंदौर में यह अनुपात 475 है। सल्फर डाई ऑक्साइड का प्रदूषण हवा में वाहनों से ही होता है। पुराने वाहन कम होने और ज्यादा ट्रैफिक जाम नहीं होने से भी इस मामले में भोपाल की हवा प्रदूषणकारी छेड़छाड़ से मुक्त है।

भोपाल में सड़कों की स्थिति अच्छी होने से हवा में धूल कणों की उपस्थिति कम है। हाल ही के वर्षो में शहर में सड़कों का जाल बिछा है। अहमदाबाद, सोलापुर और कानपुर ही दूसरे ऐसे शहर हैं जो सड़कों के मामले भोपाल से टक्कर ले सकते हैं। इसके अलावा, शहर के बीच या एकदम नजदीक ऐसी कोई औद्योगिक इकाई नहीं है, जिसका धुआं व रसायन वातावरण को प्रदूषित कर सकें। शहर में 800 छोटी बड़ी औद्योगिक इकाइयां हैं, लेकिन जैसा कि सीपीसीबी के क्षेत्रीय अधिकारी आलोक सिंघई कहते हैं, ये फैब्रिक यूनिट हैं जिनसे प्रदूषण कम फैलता है।

ये साबित हुए वरदान आबादी का घनत्व, बेहतर सड़कों का जाल और उद्योगों का न होना भी भोपाल की आबोहवा के लिए वरदान की तरह है। 268 वर्ग किलोमीटर में फैले शहर में एक वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में केवल 663 लोग रहते हैं, जबकि मुंबई में यह संख्या कई गुना ज्यादा 21,800 है। आबादी का अधिक घनत्व वाहनों की संख्या, ईंधन के प्रयोग और कार्बन डाई ऑक्साइड के उत्सर्जन को बढ़ा देता है।

भोपाल में प्रदूषण कम होने की प्रमुख वजह खुली बसाहट और हरियाली, बेहतर सड़कें और कम व नए वाहन हैं।

ए . सुधाकर, एनवायरनमेंट इंजीनियर, प्रभारी सेंट्रल जोन, सीपीसीबी





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: