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Astro Speak Astro Speak पर्व प्रसंग
व्रत, पर्व एवं उत्सवों या तीज त्योहारों की धूमधाम वाले हमारे देश में वैसे तो हर दिन एक नई उमंग और उल्लास लेकर आता है। किंतु इनमें आखातीज या अक्षय तृतीया का विशेष महत्व है। यह दिन त्रेता युगादि का दिन है। इस दिन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि आखातीज को विवाह का अबूझ मुहूर्त होता है।
विवाह-संस्कार वैदिक चिंतन धारा में विवाह नर-नारी का शारीरिक आकर्षण, आपसी राग या कामेच्छा का परिचायक नहीं है। वस्तुत: यह दो अपरिचित युवाओं को आपसी विश्वास एवं दायित्वों की डोरी में बांधने वाला संस्कार है। इस संस्कार के माध्यम से हमारे संस्कार शास्त्रियों ने युवावस्था की दहलीज पर खड़े दो अल्लहड़ व्यक्तियों में इन पांच विचारों को संस्कारित करने का सराहनीय प्रयास किया है।
>> एक-दूसरे पर अटूट विश्वास करना।>> आपस में भावनात्मक लगाव को बढ़ाना।>> मिलजुलकर निर्णय एवं काम करना।>> देवऋण एवं पितृऋण से मुक्त होना।>> पारिवारिक सामाजिक एवं धार्मिक दायित्वों का निर्वाह करना।
मुहूर्त जैसे एक अनुभवी किसान को पता होता है कि किस फसल की बुवाई कब की जाए। इसी प्रकार का अनुभव हमारे प्राचीन आचार्यो को था कि कौन सा कार्य कब किया जाए ताकि वह पूरा एवं सफल हो सके। वस्तुत: हमारे मुहूर्त शास्त्र के आचार्यो ने प्रत्येक कार्य की प्रकृति एवं प्रक्रिया का मनन एवं चिंतन कर उसके अनुरूप काल का निर्धारण किया है, जिसको मुहूर्त कहते हैं। तात्पर्य यह है कि मुहूर्त काल के उस खंड को कहते हैं जो उस कार्य की प्रकृति एवं प्रक्रिया के अनुकूल और सर्वथा उपयुक्त हो।
शुक्र के अस्तकाल में विवाह का निषेध
वैदिक ज्योतिष में शुक्र विपरीत लिंग के जातकों को आकर्षित करने वाला माना गया है। यह दांपत्य सुख, प्रेम संबंध, शारीरिक आनंद, पारिवारिक उल्लास, जीवनशक्ति एवं संतान उत्पत्ति का सूचक ग्रह है। जब यह बलवान हो तभी विवाह करना चाहिए। मुहूर्त शास्त्र के अनुसार शुक्र के अस्तकाल में जिसे आमभाषा में तारा डूबना कहते हैं विवाह का निषेध किया गया है। खगोल शास्त्र के सिद्धांतानुसार जब सूर्य एवं शुक्र में 9 अंक या उससे कम अंशों का अंतर हो, तो शुक्र अस्त हो जाता है।
इस वर्ष 7 मई को अक्षय तृतीया पड़ रही है। इस वर्ष हमारे विविध पंचागों में 5 मई से 9 मई तक अक्षांश/स्थान भेद से शुक्र अस्त हो रहा है। यहां यह स्मरणीय है कि शुक्रास्त से तीन दिन पहले उसकी वृद्धावस्था में भी विवाह का निषेध किया गया है। अत: हमारे देश में कहीं भी 5 मई से 9 मई तक शुक्रास्त हो, 7 मई को अक्षय तृतीया के दिन शुक्र का अस्तकाल या वृद्धावस्था होने के कारण मुहूर्त शास्त्र के अनुसार विवाह का निषेध रहेगा।
विवाह मुहूर्त का अपवाद आखातीज
सामान्यत: विवाह शुभ मुहूर्त में करना चाहिए। किंतु जैसे हर नियम के अपवाद होते हैं। उसी प्रकार विवाह मुहूर्त के अपवाद भी वर्ष के पांच दिन माने गए हैं। ये दिन हैं अक्षय तृतीया, भड्डली नवमी, देव उठनी (प्रबोधिनी), एकादशी, बसंत पंचमी एवं फुलैरा दोज।
हमारे धर्मशास्त्र के अनुसार किसी कारण पिता के घर में कन्या हो और उसका विवाह न हुआ हो तो ऐसी कन्या के प्रत्येक रजोकाल पर पिता को भ्रूण हत्या का पाप लगता है। ऐसी कन्याओं के विवाह का मुहूर्त न मिलने पर अक्षय तृतीया (आखातीज) अबूझ मुहूर्तो में विवाह कर देना चाहिए।
इस बार आखातीज पर विवाह करें या नहीं?
सामान्यत: आखातीज के दिन मुहूर्त का विचार किए बिना विवाह करने की परंपरा हमारे देश में हजारों वर्षो से प्रचलित है। इस विषय में निर्णय करने के दो आधार हैं, शास्त्राचार एवं लोकाचार। इनमें से शास्त्राचार के अनुसार इस दिन शुक्रास्त या शुक्र की वृद्धावस्था होने के कारण विवाह का निषेध है।
किंतु लोकाचार के अनुसार इस दिन विवाह के मुहूर्त का विचार करना अपेक्षित नहीं है क्योंकि आखातीज अपवाद का दिन है। हमेशा से आखातीज आदि अबूझ मुहूर्तो में वर-कन्या की लग्न शुद्धि का विचार नहीं किया जाता। इस विषय में ‘लोक शास्त्रियों’ का स्पष्ट मत है कि आखातीज विवाह मुहूर्त का अपवाद है। अत: इस दिन विवाह करने के लिए मुहूर्त शास्त्र के किसी भी नियम का विचार करना आवश्यक नहीं है। अत: इनके अनुसार ही अक्षय तृतीया के परंपरा के अनुसार विवाह किया जा सकता है। इस निर्णय को धर्मशास्त्र का भी समर्थन है यथा- यद्यपि शुद्धं लोक विरुद्धं ना करणीयं ना चारणीयम अस्तु।