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बंधन : लक्षण और निवारण

पराविज्ञानमानव अति संवदेनशील प्राणी है इसीलिए प्रकृति या भगवान हर कदम पर हमारी मदद करते हैं। आवश्यकता हमें सजग रहने की है। हम अपनी दिनचर्या में हमारे आसपास होने वाली घटनाओं पर नजर रखें और मनन करें तो हमें काफी सीखने को मिलेगा। विज्ञान ने एक नियम प्रतिपादित किया है- क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। ऐसे में हमें निश्चय ही मनन करना होगा कि जो हमारे आसपास घटित हो रही हैं ये किन क्रियाओं की प्रतिक्रियाएं हैं।

हमें यह भी मानना ही होगा कि विज्ञान की एक निश्चित सीमा है और पराविज्ञान की कोई सीमा नहीं है। हमको इन घटनाओं का पराविज्ञानीय आधार पर ही विश्लेषण करना पड़ेगा कि यह अनावश्यक बाधाएं या रुकावटें या संकट कहां से उत्पन्न हो रहे हैं। यह आवश्यक नहीं है कि यह किसी तांत्रिक अभिचार के कारण हो रहा है। यह स्थिति हमारी कमजोर ग्रह स्थितियों व गण के कारण भी हो सकती हैं। हम भिन्न-भिन्न श्रेणियों के अंतर्गत इसका विश्लेषण कर सक ते हैं। इनके परोक्ष में अलग-अलग परिलक्षण हैं। जनकल्याणार्थ इन लक्षणों और उनके निवारण का संक्षेप में वर्णन निम्नानुसार प्रस्तुत है -

दुकान-फैक्टरी की बाधाओं के लक्षण >> दुकान-फैक्टरी मालिक का दुकान फैक्टरी में मन नहीं लगना। अनावश्यक शारीरिक व मानसिक भारीपन रहना। >>ग्राहकों की संख्या में कमी आना। >>आए हुए ग्राहकों से मालिक द्वारा अनावश्यक तर्क-वितर्क और कलह करना। >>श्रमिकों व मशीनरी से संबंधित परेशानियां। >>दुकान या फैक्टरी जाने की इच्छा न करना। >>तालेबंदी की नौबत आना।

कार्यालय बंधन के लक्षण

>>कार्यालय बराबर नहीं जाना। >>साथियों से अनावश्यक तकरार। >>कार्यालय में मन नहीं लगना। >>कार्यालय और घर के रास्ते में शरीर में भारीपन व दर्द की शिकायत होना। >>कार्यालय में बिना गलती के भी अपमानित होना।

परिवार-घर में बाधा के लक्षण

>>पारिवारिक अशांति और कलह। >>बनते काम ऐनवक्त पर बिगड़ना। >> आर्थिक परेशानियां। >>योग्य और होनहार बच्चों के रिश्तों में अनावश्यक अड़चन। >>परिवार के किसी सदस्य का अनावश्यक शारीरिक दर्द, अवसाद, चिड़चिड़ेपन का शिकार होना। >>घर के मुख्य द्वार पर अनावश्यक गंदगी रहना। >>ईष्ट की अगरबत्तियां बीच में ही बुझ जाना। >>भरपूर घी/तेल/बत्ती रहने के बाद भी ईष्ट का दीपक बुझना/खंडित होना। >>पूजा/खाने के समय घर में कलह की स्थिति बनना।

व्यक्ति का बंधन >>हर कार्य में विफलता। हर कदम पर अपमान >>दिल दिमाग काम नहीं करना >>घर में बाहर की और बाहर रहे तो घर की सोचे। >>शरीर में दर्द होना और दर्द के बाद गला सूखना।

ज्योतिष के अनुसार जातक की कुंडली में बाधक भाव और बाधक भाव के स्वामी ग्रह की स्थिति का अध्ययन हमें थोड़ी मदद दे सकता है। ज्योतिष के सिद्धांतों के अनुसार बृहस्पति और शुक्र अथवा सूर्य और शनि अथवा राहु और मंगल में परस्पर नैसर्गिक शत्रुता के संबंध होते हैं। जन्म पत्रिका में ग्रहों की स्थिति अनुसार ग्रहों की पंचधा मैत्री चक्र तैयार किया जाता है। पंचधा मैत्री चक्र में ग्रहों की अतिशत्रुता की स्थितियां जातक के जीवन में बंधन दोष की स्थितियां पैदा करती है। छठे भाव से जातक पर तांत्रिक अभिचार से बंधन की स्थिति का अध्ययन किया जाता है।

निद्रा अवस्था में भगवान स्वप्न के माध्यम से संकेत प्रदान कर हमारी मदद करते हंै। आश्यकता इस बात की है कि हम मानसिक संतुलन बनाए रखें। हम किसी भी प्रतिकूल स्थिति में अपने विवेक व अपने ईष्ट की आस्था को न खोएं क्योंकि विवेक से बड़ा कोई साथी नहीं है और भगवान से बड़ा मददगार। इन बाधाओं से निवारण हेतु निम्नांकित उपाय कर सकते हैं,

>>ईष्ट पर आस्था और विश्वास रखें। >>स्वयं की साधना पर ज्यादा ध्यान दें। >>गलतियों को लिए ईष्ट से क्षमा मांगे। >>ईष्ट को जल समर्पित करके घर में उसका नित्य छिड़काव करें। >>जिस पानी से घर में पोछा लगता है, उसमें थोड़ा नमक डालें। >>कार्य क्षेत्र पर नित्य शाम नमक छिड़ककर प्रात: झाड़ू से साफ करें। >>घर और कार्यक्षेत्र का मुख्य द्वार साफ रखें। >>हिंदू धर्मावलंबी हैं तो गूग्गल की और मुस्लिम धर्मावलंबी लोबान की धूप दें। >>महामृत्युंजय मंत्र के जाप जन्म-जन्म के बंधनों से मुक्ति दिलाते हैं। अपनी सामथ्र्य अनुसार श्रद्धा से महामृत्युंजय मंत्र का जाप करें। >> हनुमानजी की स्तुति के नियमित पाठ से भी बंधन की पीड़ा से मुक्ति मिलती है।

हमारी या हमारे परिवार के किसी भी सदस्य की ग्रह स्थिति थोड़ी सी भी अनुकूल होगी तो हमें निश्चित ही इन उपायों का भरपूर लाभ मिलेगा।





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babay didi
Wednesday, 14th May 2008, 19:56
dear baby didi, pls. check that . thanks.