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जंगल की जमीन पर आधा भोपाल

भोपालक्या आप इस बात पर यकीन करेंगे कि राजधानी का एक बड़ा भाग जंगल में बसा हुआ है? मानें या न मानें, लेकिन सच यही है। सरकारी रिकार्ड के मुताबिक कलेक्टोरेट, कमिश्नरी, लोकायुक्त कार्यालय, अल्पसंख्यक आयोग, श्रम कार्यालय, पॉलीटेक्निक कॉलेज जैसे कई प्रमुख प्रतिष्ठान वनभूमि पर स्थित हैं।

सरकारी व गैर-सरकारी संस्थाओं-संगठनों के हजारों सभा-सम्मेलनों का साक्षी गांधी भवन, हिंदी सेवा के अलावा शादियों के लिए भी विख्यात-कुख्यात हिंदी भवन, श्यामला हिल्स स्थित आदिवासी छात्रावास, आदिम जाति अनुसंधान संस्थान, अरेरा हिल्स के कई सरकारी भवन और शहर के फैलाव को जगह देते चूनाभट्टी, कोलार रोड जैसे राजधानी के अनेक क्षेत्र राजस्व विभाग के रिकॉर्ड में जंगल की तरह दर्ज हैं। शाहपुरा पहाड़ी, सर्वधर्म कॉलोनी और केरवा के आसपास का इलाका वनक्षेत्र में आता है। रोशनपुरा चौराहा असल में वन विभाग की चौकी थी। उसके आसपास बने न्यू मार्केट, मालवीय नगर जैसे व्यावसायिक, रहवासी इलाकों के कई क्षेत्र भी वनभूमि पर ही स्थित हैं।

वन संबंधी अनेक कानूनों के अस्तित्व में आ जाने से इस गफलत को सुधारना अब कठिन हो गया है, लेकिन राजस्व और वन विभाग के चंद अधिकारियों व कर्मचारियों को छोड़कर किसी को इसका अंदाजा नहीं है। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के भोपाल स्थित कार्यालय के सूत्र बताते हैं कि कानून में वनभूमि के गैर-वनीय उपयोग पर अधिकारियों को एक से 15 दिन की जेल की सजा का भी प्रावधान है। केरल और तमिलनाडु में तो कुछ वरिष्ठ अधिकारी सजा भी भुगत चुके हैं।

आखिर इस संकट की वजह क्या है? दरअसल, मध्यप्रदेश के निर्माण के पहले 1954 में भोपाल के तत्कालीन आयुक्त एमएस दास के आदेश से भोपाल राज्य की छोटे, बड़े घास की सारी जमीन संरक्षित वन घोषित कर दी गई थी। बाद में 1960 में निर्माण कार्र्यो के लिए कुछ जमीन राजस्व को हस्तांतरित की गई, लेकिन उन्हें रिकॉर्ड में दर्ज नहीं किया गया।

राजधानी के इस विशाल इलाके को गोदाबर्मन प्रकरण में दिए गए 1996 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक वन माना गया है। वन संरक्षण अधिनियम-1980 में भी वन भूमि का गैर-वनीय उपयोग वर्जित है। यह कानून वन और राजस्व विभागों के सभी श्रेणी के वनों पर लागू होता है। यदि गैर-वनीय उपयोग के लिए वनभूमि का हस्तांतरण जरूरी हो तो उसका प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट भेजा जाता है जिस पर शीष अदालत द्वारा नियुक्त केंद्रीय साधिकार समिति (सीईसी) विचार करती है। यदि सब कुछ ठीक पाया गया तो जमीन हस्तांतरित की जाती है, लेकिन उसके बदले दोगुनी जमीन और उस पर वृक्षारोपण का खर्च देना होता है।

हाल ही में लागू हुए अनुसूचित जनजाति एवं अन्य परंपरागत वन निवासी (वनाधिकारों पर मान्यता) अधिनियम में वन में बसे और आजीविका के लिए उन पर आधारित आदिवासियों को उनके हक की जमीन के अधिकार पत्र देने के प्रावधान हैं, लेकिन सवाल यह भी उठ रहा है कि यह कानून शहर के बीच में दर्ज वन भूमि पर बसी आबादी और दफ्तरों पर कैसे लागू होगा? गौरतलब है कि पूर्व में तत्कालीन भोपाल रियासत के रेवेन्यू सेकेट्री के 16 जनवरी 1916 के आदेश के मुताबिक शहर के जंगलों को आरक्षित वन घोषित किया गया था।

वन विभाग के प्रमुख सचिव प्रशांत मेहता कहते हैं कि राजधानी में वनभूमि पर बसाहट के बारे में उन्हें जानकारी नहीं है, लेकिन यदि 1980 के पहले का कोई आदेश होगा तो उसके आधार पर वनभूमि को राजस्व में तब्दील कर दिया जाएगा। वन विभाग भोपाल के आसपास की करीब दो हजार हेक्टेयर जमीन नागरिक सुविधाओं के विकास के लिए राजस्व विभाग को हस्तांतरित करने वाला है।

उधर वन मंडलाधिकारी रवींद्रनाथ सक्सेना के मुताबिक वर्ष 1961 में भोपाल के कई इलाकों का डीनोटीफिकेशन हुआ था जिसके अभिलेख भी हैं। वन विभाग के तहत आरक्षित, संरक्षित और गैर-वर्गीकृत वनों की श्रेणियां होती हैं। इसी तरह बड़े, छोटे झाड़ के जंगल राजस्व वन कहे जाते हैं, लेकिन इन दोनों विभागों के जंगलों पर वन संरक्षण अधिनियम के प्रावधान लागू होते हैं।

नगर नियोजन विशेषज्ञ और पूर्व आईएएस अधिकारी एमएन बुच कहते हैं कि जवाहर चौक या रोशनपुरा नाका वन क्षेत्र में हैं तो शहर के ऐसे सभी क्षेत्रों का सर्वेक्षण करके स्थिति स्पष्ट करना चाहिए। इनमें से बसाहट वाले इलाकों को छोड़कर शेष वन विभाग को सौंप देना चाहिए। आखिर बसाहट को दोबारा जंगल नहीं बनाया जा सकता।





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