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गिद्धों के अस्तित्व पर मंडराता संकट

वड़ोदरापशुओं के इलाज के दौरान उन्हें दी जाने वाली दर्द निवारक दवा डायक्लोफेनिक ही गिद्धों के अस्तित्व के लिए सबसे बड़ा खतरा है, यह बात आज से करीब दो दशक पहले ही उजागर हो गई थी। इसके बावजूद इस दवा का इस्तेमाल जारी है और गिद्धों की मौत भी।

वन्यजीव वैज्ञानिक डॉ. नीता शाह के अनुसार, गिद्धों के मरने की यही रफ्तार रही तो जल्दी ही उनका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। वाइल्ड लाइफ पर पीएचडी करने वाली एशिया की पहली विशेषज्ञ नीता ने बताया कि डायक्लोफेनिक से गिद्धों की मौत होने की जानकारी करीब 18 साल पहले ही मिल गई थी, लेकिन तब से लेकर आज तक गिद्धों में दवा के असर को कम करने का कोई तरीका ढूंढ़ा नहीं जा सका है।

उन्होंने बताया कि उपचार के बाद पशुओं के शरीर में इस दवा के रसायन घुल जाते हैं और जब ये पशु मरते हैं तो उनका मांस खाने वाले गिद्धों की किडनी और लिवर को गंभीर नुकसान पहुंचता है, जिससे वे मौत का शिकार हो जाते हैं। इन्हीं कारणों से भारत में गिद्धों की संख्या तेजी से कम हो रही है।

अकेले गुजरात में ही गिद्धों की संख्या 2500 से घटकर 1400 रह गई है। कभी राजस्थान व मध्यप्रदेश में भी गिद्ध भारी संख्या में पाए जाते थे, लेकिन अब कहीं दिखाई नहीं देते। गिद्धों की जनसंख्या को बढ़ाने के सरकारी प्रयासों को मिली नाकामी से भी इनकी संख्या में गिरावट आई है। डॉ. नीता शाह का कहना है कि गिद्ध जोड़े साल में औसतन एक ही बच्चे को जन्म देते हैं।

इनकी प्रजनन क्षमता भी संवर्धन के प्रयासों में एक बड़ी बाधा है। नौ प्रजातियां : भारत में बियर्डेड, इजिप्शयन, स्बैंडर बिल्ड, सिनेरियस, किंग, यूरेजिन, लोंगबिल्ड, हिमालियन ग्रिफिम एवं व्हाइट बैक्ड जैसी गिद्धों की नौ प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से चार प्रवासी किस्म की हैं।





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