विशेष टिप्पणी. कोई साल भर पहले की ही बात है जब राष्ट्रपति जार्ज बुश अपने देश की जनता को समझाने में लगे थे कि भारत के साथ संबंधों का अमेरिकी जनता के हित में कितना महत्व है। बुश का कहना था कि अमेरिकी जनता को परमाणु समझौते का इसलिए समर्थन करना चाहिए कि अमेरिका की कुल आबादी से अधिक का भारत में ऐसा मध्यम वर्ग तैयार हो गया है जो अमेरिकी उपभोक्ता सामान खरीदने की क्षमता रखता है। भारत की यह नई संपन्नता अमेरिका की आर्थिक समृद्धि के लिए कितनी जरूरी है, बुश ने समझाया था।
भारत की संपन्नता के महत्व को लेकर अपने देश की जनता की चिरौरी करने वाले बुश अब यह कहना चाह रहे हैं कि अगर अमेरिकियों को भूखे पेट रहना पड़ा तो उसके लिए भारत का वही मध्यम वर्ग जिम्मेदार होगा जो अमेरिकी सामान खरीदने के लिए तैयार बैठा है। विश्वभर में खाद्यान्न की बढ़ती हुई कीमतों का कारण भारत के 35 करोड़ की आबादी वाले मध्यम वर्ग को बताया गया है।
अमेरिका में चुनाव सिर पर हैं। मंदी का दौर अगर इसी तरह चलता रहा और कीमतें काबू में नहीं आई तो उसका खामियाजा बुश की पार्टी को भुगतना पड़ेगा। आम अमेरिकी कड़कती हुई ठंड और बर्फीले तूफान सहन कर सकता है पर खाद्यान्न के लिए जेब से अतिरिक्त डॉलर निकलते ही उसे भविष्य की चिंता होने लगती है। डॉलर के मामले में वह ‘ठाकुरजी’ और ‘ठाकुर साब’ में फर्क नहीं करता।
बुश का ताजा बयान और उनके पहले विदेश मंत्री कोंडोलिजा राइस द्वारा की गई टिप्पणी से स्पष्ट है कि अमेरिकी नेताओं को भारत का नया अवतार पसंद नहीं आ रहा है। अमेरिकी नेतृत्व भारत को उसी नजरिए से देखना चाहता है, जो स्थिति आज से कोई 40-45 साल पहले थी। तब भारत में शासकीय नियंत्रण वाली राशन की दुकानों के सामने लंबी-लंबी कतारें लगी रहती थीं और लोग पी.एल. 480 के तहत अमेरिका से आयात किया जाने वाला वह लाल गेहूं खाकर जिंदा रहते थे, जो वहां शायद जानवरों को खिलाया जाता था।
बुश की परेशानी यह है कि उन्हें पेट्रोलियम पदार्र्थो की बढ़ती हुई कीमतों पर काबू पाना है और खाद्य पदार्र्थो की कमी भी नहीं होने देना है। वे अपने यहां की मक्का और अन्य खाद्यान्नों का इस्तेमाल बायो फ्यूल बनाने और जानवरों को मोटा करने के लिए करना चाहते हैं और अपने देशवासियों को पीत्जा और पास्ता खिलाने के लिए हमारा गेहूं और चावल सस्ते दामों पर खरीदने की मंशा रखते हैं। ऐसा शायद अब संभव नहीं। पहले अवश्य ही ऐसा रहा है। भारतवासियों की जरूरतों की कीमत पर एक लंबे अरसे तक यूरोप-अमेरिका का पेट भरा जाता रहा है। भारत का मध्यम वर्ग अब थोड़ा संपन्न हो गया है।
वह ‘ठाकुरजी’ को चढ़ाया जाने वाला दूध ‘ठाकुर साब’ की रोटी के मक्खन के लिए देने को तैयार नहीं। बुश को शायद समझ में आ रहा है कि केवल आतंकवाद का भूत दिखाकर ही अमेरिकियों पर लंबे समय तक राज नहीं किया जा सकता। जब महंगाई के बुरे वक्त से भारत सहित दुनिया के कई दूसरे मुल्क गुजर रहे हैं, बुश अमेरिका को उससे बचाए रखना चाहते हैं।
बुश ने भारत के बारे में जो कुछ कहा है, उसमें भी इस प्रशंसा को तो ढूंढ़ा ही जा सकता है कि अमेरिकियों की नजर में भारत के 35 करोड़ लोग काफी संपन्न हो गए हैं। दर्द की बात यह है कि भारत के बाकी 65 करोड़ की चर्चा कोई नहीं करना चाहता। बुश से तो निश्चित ही अपेक्षा नहीं की जा सकती, पर हमारे नेता भी पूरी तरह निश्चिंत हैं।