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बस्तर की गुफाओं में थे आदिमानव

रायपुर.aadimanav बस्तर की कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान स्थित कुटुंबसर और दंडक गुफाओं में आज से 6940 से लेकर 4030 साल पहले तक आदिमानव रहते थे। अहमदाबाद स्थित भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों ने गुफा के अंदर मिले कोयले तथा अनाज के कणों की कार्बन डेटिंग और अन्य प्रयोगों के आधार पर इसकी पुष्ट की है।

उस समय घाटी में रहने वाले लोग खेती भी करते थे। अनियमित बारिश और लगातार सूखे की वजह से लोगों ने करीब चार हजार साल पहले गुफाओं में रहना बंद कर दिया।

भौतिकी अनुसंधान प्रयोगशाला के वैज्ञानिक एमजी यादव ने बताया कि दोनों ही गुफाओं में पिछले 11 सालों से अलग-अलग तरह के शोध किए जा रहे हैं। मौसम में पिछले कई हजार सालों के दौरान आए बदलाव और दक्षिण पश्चिमी मानसून के इतिहास का पता लगाने गुफा के अंदर से प्रमाण जुटाए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि देश की किसी अन्य गुफा में मनुष्य के रहने के इतने पुख्ता प्रमाण पहले कभी नहीं मिले।

श्री यादव का कहना है कि इन दोनों गुफाओं को संरक्षित कर गहराई से जांच होनी चाहिए। श्री यादव के साथ केएस सारस्वत, आईबी सिंह और आर रमेश भी शोध में शामिल थे। इसका रिसर्च पेपर करंट साइंस जर्नल में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों को कुटुंबसर गुफा के मुहाने से अंदर करीब 100 मीटर की दूरी पर 32 सेमी. के हिस्से में अलाव के निशान मिले, जहां से चार नमूनों को जांच के लिए निकाला गया था।

इसी तरह दंडक गुफा के दूसरे हिस्से में 120 मीटर दूर जमीन की सतह से 14 सेमी. नीचे से अलाव के कुछ नमूने लिए गए। सारे नमूनों का कार्बन डेटिंग पद्धति से परीक्षण किया गया, ताकि टुकड़ों के तैयार होने के सही समय का अंदाज मिले। कुटुंंबसर गुफा से निकाले गए कोयले के चार में से तीन टुकड़े आज से 4030 से लेकर 6940 साल पुराने पाए गए। इसी तरह दंडक गुफा के अंदर से मिले टुकड़ों के 5042 से 5318 साल पुराने होने की पुष्टि हुई।

प्रयोगशाला के वैज्ञानिक श्री यादव ने दावा किया है कि आदिमानव ने गुफाओं का इस्तेमाल 6940 से 4030 साल के बीच किया। कुटुंबसर गुफा में जमीन के अंदर चार अलग-अलग गहराई पर मिले कोयले के टुकड़ों से अनुमान लगाया जा रहा है कि गुफा का इस्तेमाल मनुष्य ने चार अलग-अलग कालों में किया होगा।

गुफा के अंदर मक्के जैसे अनाज के कुछ दाने भी मिले। इन दानों की स्टीरियो बाइनाकुलर माइक्रोस्कोप से जांच की गई। इसमें तीन तरह के अनाज और घास के बीजों की पहचान हो गई, जिसमें से कुछ का उत्पादन आज भी कांगेर घाटी इलाके में होता है। कुटुंबसर गुफा में अनाज के कुछ टुकड़े जमीन के अंदर दबे मिले। 30-32 सेमी. नीचे मिला अनाज का टुकड़ा करीब 6940 साल पुराना है।

इससे ऊपर 14 से 17 सेमी. गहरी सतह में मिले अनाज के दाने के अवशेष 4300 साल पुराने थे। गुफा में मिले प्रमाणों के आधार पर वैज्ञानिकों का कहना है कि आदिमानव न केवल खेती करता था, बल्कि उसे आग का इस्तेमाल आता था।

अनाज और कोयले के टुकड़े दंडक गुफा के उस हिस्से में मिले हैं, जहां एक सुरंग के रास्ते लेटकर सरकते हुए ही पहुंचा जा सकता है। शोधकर्ता सीमित इलाके में शोध के कारण आदिमानव द्वारा इस्तेमाल किए गए बर्तन, हथियार, औजारों आदि की तलाश नहीं कर पाए।

1958 में हुई थी कुटुंबसर की खोज
कुटुंबसर गुफा की खोज शंकर तिवारी ने 1958 में की थी। उसके बाद 1993 के आसपास दंडक गुफा को फारेस्ट विभाग के रेंज अफसर पतिराम तारम और गार्ड रामदास बघेल ने खोजा। दंडक गुफा में लोगों के प्रवेश पर रोक लगाई गई है।

गुफा के पानी की भी जांच
कुटुंबसर और दंडक गुफा के अंदर रिसने वाले पानी के आधार पर मध्यभारत में दक्षिण-पश्चिमी मानसून के इतिहास की पड़ताल हो रही है। प्रयोगशाला के वैज्ञानिक एमजी यादव ने बताया कि स्टेलेग्माइट और स्टेलेक्टाइट से भरी गुफाओं में रिसने वाले पानी के आइसोटोप का विश्लेषण कर यह पता लगाने की कोशिश होगी कि मौसम में बदलाव किस तरह से आया।

जांच करीब एक साल तक जारी रहेगी। कुछ नमूनों को जांच के लिए विदेश भेजा जाएगा। श्री यादव ने बताया कि इस अनुसंधान में दो से तीन साल का वक्त लग सकता है। कांगेर घाटी नेशनल पार्क के डायरेक्टर अमरनाथ प्रसाद ने बताया कि प्रयोगशाला के प्रतिनिधि को गुफा में जाकर पानी के सैंपल लेने की अनुमति दी गई है।





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