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ईमानदारी की एक अद्भुत मिसाल

जीवन दर्शन. काफी वर्षो पूर्व की बात है। शंकरलाल शर्मा जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, हमारे कस्बे में आयुर्वेदिक औषधालय में वैद्य थे। वे चिकित्सा कार्य में पारंगत, निलरेभी, सज्जन एवं व्यवहारकुशल होने के कारण कस्बे में अत्यंत लोकप्रिय थे। उन्होंने जनहितार्थ स्वास्थ्य संबंधी कई पुस्तकों का लेखन भी किया था। इन्हीं वैद्यजी के जीवन की एक घटना है, जो ईमानदारी की अद्वितीय मिसाल पेश करती है।

वैद्यजी ने एक बार ट्रस्ट के मुखिया से रोगियों को नि:शुल्क ‘स्वर्ण भस्म’ तैयार करके देने के लिए तीन तौला सोना मांगा। सेठजी ने अपने घर से वैद्यजी को सोना दे दिया। सोने की उन्होंने कहीं भी लिखा-पढ़ी नहीं की थी।

स्वर्ण भस्म के लिए सोना देने वाले वाकये के लगभग पच्चीस साल बाद ट्रस्ट के मुखिया के बड़े बेटे प्रवास के लिए कस्बे में आए। तब उनके पिता की मृत्यु हो चुकी थी। वैद्यजी भी काफी वृद्ध हो चुके थे। एक दिन वैद्यजी सेठजी के बड़े बेटे से मिलने के लिए उनके निवास पर गए। वहां पर उन्होंने सेठजी के बड़े बेटे से निवेदन किया कि, ‘रोगियों को नि:शुल्क ‘स्वर्ण भस्म’ देने के लिए मैंने आपके पिताजी से तीन तोला सोना काफी वर्षो पूर्व लिया था।

लेकिन, ट्रस्ट की चिकित्सकीय व्यस्तताओं के चलते काफी वर्षो बाद भी मैं स्वर्णभस्म नहीं बना सका। अत: आप इसे ले लीजिए।’ वैद्यजी की बात सुनकर सेठजी के बड़े बेटे बोले, ‘वैद्यजी! मेरे पिताजी ने आपको सोना कब दिया था, मुझे मालूम नहीं।

न ही इसका कहीं इंद्राज है और न ही कभी पिताजी ने इस संबंध में घर में चर्चा की, इसलिए मैं आपसे यह सोना नहीं ले सकता।’ सेठजी के बड़े बेटे के उपयरुक्त बात कहने पर वैद्यजी उनसे बोले, ‘बाबू! सेठजी ने यह सोना मुझे दान में नहीं दिया था, स्वर्णभस्म बनाने के लिए दिया था। अब स्वर्णभस्म बनाने की स्थिति नहीं है। अत: यह सोना आप स्वीकार करें और काफी आग्रह के साथ उन्होंने सोना वापस कर दिया।’





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