bhaskar Web English
HomeNewsMetrosJaipur Jaipur

मध्यम वर्ग जानता है दाने-दाने की कीमत

जयपुर/नई दिल्ली. भारतीय मध्यम वर्ग की खुराक से खाद्यान्न संकट पैदा होने संबंधी अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के बयान को पूरे देश ने एक स्वर में खारिज कर दिया है। राजस्थान और देश के समाजशास्त्रियों व खाद्यान्न विशेषज्ञों का कहना है कि मध्यम वर्ग में आई समृद्धि के कारण प्रतिस्पर्धा तो बढ़ी है लेकिन वह तरक्की के लिए ही, खाने के लिए नहीं। हम तो व्रत-उपवास के जरिए ही हर साल लाखों टन खाद्यान्न बचा लेते हैं।

धार्मिक आस्थाओं के चलते जूठा छोड़ना पाप समझते हैं, जबकि अमेरिका सहित पश्चिमी देशों में ऐसा नहीं होता। जयपुर के समाजशास्त्री डॉ. राजीव गुप्ता कहते हैं, देश-प्रदेश की संस्कृति के अनुरूप अन्न के हर दाने को भगवान का प्रसाद मानकर खाया जाता है। जूठन नहीं छोड़ने के संस्कार हर बच्च विरासत में प्राप्त करता है। भले ही परिवार कितना भी आधुनिक क्यों न हो।

उदयपुर के समाजशास्त्री डॉ.ललित कुमावत कहते हैं, यह सही है कि मध्यम वर्ग में एक प्रतिस्पर्धा होती है। जैसा पड़ोसी के पास देखता है, वैसा ही लाने का प्रयास किया जाता है लेकिन यह खाने पर लागू नहीं होता। श्रीगंगानगर की समाजशास्त्री डॉ. पूनम बजाज के अनुसार पिछले एक दशक में मध्यम वर्ग की खाद्य आदतों में आए बदलाव से अनाज का उपभोग बढ़ने की बजाय कम ही हुआ है।

हमारा फास्ट उनका ब्रेकफास्ट
जयपुर के पं. चंद्रमोहन दाधीच एक शोध के हवाले से बताते हैं कि राज्य की डेढ़ करोड़ महिलाएं और तीस लाख पुरुष हर सप्ताह उपवास करते हैं। इनमें से आधी महिलाएं मध्यम वर्ग से आती हैं।

अगर ऐसा मान लिया जाए कि राज्य के एक करोड़ 80 लाख लोग साल में 10 ही दिन उपवास रखते हैं और अनाज की औसत 150 ग्राम भी मानी जाए तो अकेले राजस्थानी ही हर साल कम से कम दो करोड़ 80 लाख किलो खाद्यान्न बचाते हैं। दूसरी ओर अमेरिका में ब्रेकफास्ट से डिनर तक कम से कम चार बार खाने का प्रचलन है।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: