Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood परदे के पीछे
नेपाल के प्रसिद्ध राजनीतिक परिवार की मनीषा कोइराला ने सुभाष घई की ‘सौदागर’ से फिल्मों में प्रवेश किया था। विनोद चोपड़ा की ‘1942 ए लव स्टोरी’ में जावेद अख्तर का सफलतम गीत ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा..’ उस पर फिल्माया गया तो लगा कि गीत में प्रयुक्त सारी उपमाएं उसके सौंदर्य का समुचित बखान करती हैं।
माधुरी दीक्षित के शिखर के उन दिनों में मनीषा कोइराला के सौंदर्य और अभिनय ने उसे सितारा सिंहासन का जबर्दस्त उम्मीदवार बनाया। परंतु मनीषा की अति आधुनिक जीवनशैली और श्रेष्ठ वर्ग की स्वाभाविक अकड़ के कारण सुपर सितारों के साथ उसे फिल्में नहीं मिली।
मीना कुमारी से मनीषा तक लगभग सभी नायिकाएं शराबनोशी करती रही हैं परंतु मनीषा ने सब कुछ सरेआम किया। भारतीय पुरुष बिंदास और खिलंदड़ स्त्री को देखते ही हड़बड़ा जाता है क्योंकि पारंपरिकता के घूंघट में लुकी-छुपी सकुचाई सी स्त्री ही उसे सुविधाजनक लगती है। वह चाहता है कि स्त्री उसकी कमतरी को ढांके रखे। दरअसल वह न स्वयं स्वाभाविक रूप में उजागर होना चाहता है और ना ही स्त्री को पूरी तरह अभिव्यक्त होने देना चाहता है।
पवन करण की ‘फोटो सेशन’ नामक कविता में पंक्तियां हैं-मुझ पर बहुत भार है अपनी इस देह का, मैं इस भार को उतारकर खुद को हलका महसूस करना चाहती हूं, तुम्हारे साथ सपनों और चाहतों से लबालब साथ नहीं, बस एक जीवन जीना चाहती हूं और उसी चाहत भरे जीवन से निकलकर बाहर आई यह मेरी एक इच्छा है जिसे मैं पूरा करना चाहती हूं।
पवन करण की रचनाओं खासकर उनका संकलन ‘स्त्री मेरे भीतर’ में स्त्री के अपने देह धर्म को समझने और जीने की ललक के साथ ऐसा आभास होता है कि केवल यौन स्वतंत्रता ही उसका अभीष्ट है जबकि आर्थिक स्वतंत्रता के बिना वह पूरी तरह अभिव्यक्त नहीं हो सकती।
बहरहाल मनीषा कोइराला कुछ ही वर्षो में फिल्म उद्योग के हाशिये में चली गईं क्योंकि उसका साहस शिखर पुरुषों को कष्ट देता था। शीघ्र ही अफजल द्वारा बनाई ‘महबूबा’ का प्रदर्शन होने जा रहा है जो विगत कई वर्षो से बन रही है। इस भव्य फिल्म में कैमरामैन अशोक मेहता ने मनीषा के सौंदर्य को प्रस्तुत किया है।
हाल ही में मनीषा ने अपना वजन घटाया है और अब तरोताजा होकर दूसरी पारी खेलना चाहती हैं। उनका मौजूदा रूप किसी भी समकालीन नायिका से कम नहीं हैं परंतु दर्शक केमन में सितारों की उम्र इस कदर गहरी अंकित होती है कि वे आंख द्वारा देखे गए वर्तमान स्वरूप से ज्यादा यकीन अपनी स्मृति में अंकित कुछ बातों से करते हैं। सोफिया लॉरेन और एलिजाबेथ टेलर उम्र के हर दौर में चमत्कारिक लगी हैं परंतु दुर्भाग्यवश हर दौर में काम नहीं मिला। मनीषा इस मिथ को तोड़ सकती हैं।