HomeVichaar Vichaar

सबसे ऊपर है संसद की गरिमा

लोकसभा देश के लोकतंत्र की सबसे बड़ी पंचायत है, जहां जनता के चुने हुए प्रतिनिधि अपने मतदाताओं और जनहित की मांग बुलंद करते हैं। यदि यह पंचायत खुद विवादास्पद हो जाए और लोग इसके आचरण को संदेह की दृष्टि से देखने लगें, तो हमारे लोकतंत्र के लिए इससे ज्यादा दुखद बात और कोई नहीं हो सकती। पिछले दिनों स्पीकर ने 32 सांसदों के संसदीय व्यवहार को अमर्यादित और आपत्तिजनक करार देते हुए उनके नाम अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए सदन की विशेषाधिकार समिति के पास भेज दिए।

जिस पर हंगामा होना निश्चित था, क्योंकि भारतीय लोकसभा के इतिहास में ऐसी कड़ी कार्रवाई पहली बार प्रस्तावित की जा रही थी। संयोग से ये सभी सांसद विपक्ष के थे। इन सांसदों और इनकी पार्टियों ने स्पीकर की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करना शुरू कर दिया और कहा गया कि स्पीकर कोई ‘शासक’ नहीं है और सदस्य उसकी ‘प्रजा’ नहीं है।

यह सही है कि सांसदों का आचरण कई बार संसदीय मर्यादा के अनुकूल नहीं होता और स्पीकर को इससे सदन का सम्मान बचाने के लिए बिजली की बत्तियां और टीवी कैमरे तक बंद कराने पड़ते हैं। लेकिन अपरिपक्व लोकतंत्र और अर्ध साक्षर देश के जनप्रतिनिधियों को संभालने के लिए ज्यादा उदार और संवेदनशील तरीकों की जरूरत है। स्पीकर पूरे सदन का सबसे सम्मानित प्रतिनिधि होता है, जिस पर हर पार्टी के सांसदों को भरोसा होता है।

एक बार इस पद पर पहुंच जाने के बाद व्यक्ति पार्टी और सरकार के हितों से ऊपर उठ जाता है। लोकसभा के अंदर स्पीकर की हर कार्रवाई ऐसी होनी चाहिए जिससे उनकी निष्पक्षता और गंभीरता पर कोई संदेह न हो। सदस्यों को, विशेषतौर पर विपक्ष को भी अपने आचरण में संसदीय मर्यादाओं का ख्याल रखना चाहिए।

असहमति का सम्मान करना लोकतंत्र का मेरुदंड है, जिसे सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को अंगीकार करना होगा, वरना ऐसे अप्रिय टकराव में सबसे ज्यादा नुकसान हमारी लोकतांत्रिक परंपराओं का ही होगा। यह अच्छी बात है कि सदन के स्थगन से पहले स्पीकर ने विपक्ष के 32 सांसदों को कोपमुक्त करने की दरियादिली दिखाई, लेकिन भविष्य में ऐसे टकरावों से बचा जाए तो यह माननीय स्पीकर, माननीय सांसदों और सम्माननीय संसद की मर्यादा के लिए उचित होगा।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: