वाशिंगटन. शरीर की आनुवांशिकी पर पर्यावरण के प्रभाव संबंधी शोध से अवसाद पर जल्दी असर करने वाली दवाओं के विकास की राह नजर आ रही है। पता चला है कि एपीजेनेटिक्स (पर्यावरण आनुवांशिकी) का अवसाद और अवसाद विरोधी दवाओं से गहरा नाता है।
अवसाद जैसी मनो-शारीरिक बीमारियों का संबंध जेनेटिक्स के बजाय एपीजेनेटिक्स से ज्यादा है। जेनेटिक परिवर्तनों में किसी जीन के डीएनए में परिवर्तन होता है, जबकि एपीजेनेटिक बदलाव में जीन तो यथावत बने रहते हैं पर भोजन, तनाव और मां की देखभाल जैसे पर्यावरण संबंधी तत्व डीएनए को सहारा देने वाले क्रोमेटिन जैसे अणुओं पर असर डालते हैं। क्रोमेटिन वे अणु होते हैं, जो जीन को गुणसूत्रों (क्रोमोजोम) के पैकेज में बांधते हैं।
कुछ रासायनिक क्रियाएं क्रोमेटिन पर प्रभाव डालती हैं, जो डीएनए कोड पर असर डालकर किसी जीन को सक्रिय या निष्क्रिय कर सकते हैं। इससे किसी प्रोटीन का उत्पादन कम या ज्यादा हो सकता है, जो शारीरिक या व्यवहार संबंधी बदलाव का कारण हो सकता है। यह बदलाव पालकों से बच्चों में भी हस्तांतरित हो सकता है। मस्तिष्क के क्रोमेटिन में यह बदलाव गर्भावस्था से वृद्धावस्था तक लगातार रेगुलेट होता रहता है।
चूहों पर किए गए प्रयोग में पाया गया कि मां की देखभाल में अंतर से तनाव के प्रति चूहों के हार्मोन व व्यवहार संबंधी प्रतिकिया में बहुत अंतर आ जाता है। शोध में शामिल डॉ. शैहरैम एकबैरियन ने बताया कि इससे तनाव, मूड संबंधी बदलाव व चिंता जैसे मनोरोगों का प्रभावी इलाज खोजा जा सकेगा।
डलास स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ साउथवेस्टर्न मेडिकल स्कूल के डॉ. एरिक नेसलर ने सोमवार को अमेरिकन साइकिएट्रिक एसोसिएशन की सालाना बैठक में एपीजेनेटिक्स पर सेमीनार आयोजित किया था, जिसमें कई वैज्ञानिकों ने एपीजेनेटिक्स व अवसाद के रिश्तों पर अपना शोध प्रस्तुत किए।
* ‘अवसाद बढ़ाने वाली प्रक्रिया को अभी पूरी तरह से समझा नहीं गया है। बीमारी का लंबे समय तक बने रहने का चरित्र और एंटीडिप्रेसंट उपचार को देरी से मिलने वाला प्रतिसाद लंबे समय से रहस्य बना हुआ है। नए शोध से इसे दूर करने में मदद मिलेगी।’
डॉ. एरिक नेसलर, यूनिवर्सिटी ऑफ साउथवेस्टर्न मेडिकल स्कूल, डलास