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पानी नहीं, काम ठप

जयपुर. आमेर की ऐतिहासिक विरासत में नई जान फूंकने के लिए करोड़ों रुपए के खर्च से चल रहे जीर्णोद्धार कार्य पानी की कमी के कारण ठप होने की कगार पर हैं। इससे चिंतित आमेर विकास व प्रबंधन प्राधिकरण (एडीएमए) की आस अब परियों के बाग और बीसलपुर पर टिकी हुई है। गौरतलब है कि पानी की कमी के चलते आमेर के परकोटे, केसर क्यारी व शीशमहल के सामने के गार्डन और हाथी गांव में निर्माण कार्य लगभग रुक गए हैं।

हालांकि मावठा सूखने के बाद पानी के टैंकरों का सहारा लिया जा रहा था, लेकिन अब भीषण गर्मी के चलते टैंकरों के भाव बढ़ने से ठेकेदारों ने हाथ खींचने शुरू कर दिए हैं। तेज धूप में जीर्णोद्धार कार्य के दौरान तराई के लिए ज्यादा पानी नहीं मिलने से महल के चारों तरफ पहाड़ी पर बनी सुरक्षा दीवार (परकोटा) चटखने लगी है तथा हाल में संवारे गए शाही गार्डन झुलस गए हैं।

इस स्थिति में एडीएमए सारे काम छोड़ पानी के विकल्प तलाशने में लगा है। इसकी पहली कड़ी में आमेर महल में मावठे के बाद पानी की सप्लाई का मुख्य स्रोत रहे परियों के बाग को पीडब्लूडी से एडीएमए ने अपने अधीन ले लिया है। जल्द ही यहां पानी संग्रह करने के सदियों पुराने कुए-बावड़ियों को सहेजने के अलावा पानी के नए विकल्प तैयार किए जाएंगे।

आमेर महल अधीक्षक जफर उल्ला खान के अनुसार, ‘हमने सर्वे आदि से पता लगाया है कि यहां पहाड़ियों का पानी ठहराव होने से पानी का लेवल अपेक्षाकृत ठीक है। इसलिए मिट्टी में दब चुके कुओं-बावड़ी की खुदाई करने के अलावा नए ट्यूबवेल लगाए जाएंगे।’

दूसरा, केसर क्यारी में रंग भरने और शाही बगीचों को हमेशा पानी से तर रखने के लिए आला अधिकारी बीसलपुर परियोजना का कुछ पानी मावठे तक पहुंचाने के लिए मुख्यमंत्री से गुहार कर रहे हैं।

एडीएमए एक्सईएन बीडी गर्ग कहते हैं कि पानी की किल्लत इतनी बढ़ गई है कि अब तक संवारे बगीचों को सहेजने और मावठे के जलस्तर के स्थायी समाधान के लिए आला अधिकारियों के प्रयास से बीसलपुर परियोजना को मावठे तक जोड़े जाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

यूं बुझेगी परियों के बाग से प्यास
राजवंश काल में यह महल का प्रमुख बाग हुआ करता था। करीब 10-12 बीघा के बाग में फल-फूलों की बहार रहती थी। पानी की आपूर्ति के लिए यहां ऐतिहासिक कुओं सहित दो बावड़ी भी बनाई गईं। इनमें एक कुआं अफगान शैली में बना हुआ है।

सभी कुएं-बावड़ी प्राचीन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम से जुड़े हुए हैं। जब मावठे में पानी खत्म हो जाता था, तो आमेर महल में पानी की सप्लाई इन्हीं कुओं से होती थी। कालांतर में कुछ कुएं मिट्टी में दब गए, जबकि एकाध में अभी भी पानी नजर आता है। अब इनकी खुदाई कराने के अलावा पहाड़ी क्षेत्र से पानी की आवक के लिए सुगम रास्ते बनाए जाएंगे।

पर्यटक देखेंगे सौहार्द की गंगा
परियों का बाग को विदेशी पावणों के लिहाज से संवारकर मुख्य पर्यटन केंद्र बनाया जाएगा। पर्यटक यहां सुस्ताने सहित आसानी से पार्किग कर महल तक विकसित किए जा रहे वॉक वे के अलावा छोटे साधनों से महल तक पहुंचेंगे।

जफर उल्ला खान बताते हैं कि यहां स्थित मंदिर और मजार जो सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल है, उससे विदेशी पावणो भी वाकिफ होंगे। साथ ही यहां बने अफगानिस्तानी शैली के कुएं को मूल स्वरूप में लाकर इसमें नीचे तक जाने के लिए बने स्लेप (कुएं के चारों ओर करीब 7 फुट रास्ता) और हिंदू-अरबी शैली में बनी पेंटिंग निखारी जाएगी।





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