सितंबर 1996 में जब देवगौड़ा सरकार के कानूनमंत्री रमाकांत खलप ने पहली बार महिलाओं को लोकसभा और राज्य की विधानसभाओं में तैंतीस प्रतिशत आरक्षण दिए जाने का विधेयक पेश किया था, तभी यह एहसास हो गया था कि इसका भविष्य उज्ज्वल नहीं है। आज बारह वर्ष बाद फिर वैसा ही दृश्य उपस्थित है। इस बीच गुजराल और वाजपेयी सरकारों ने भी इस मुद्दे पर कोशिश की, लेकिन गतिरोध पर पार न पा सकीं। क्या मनमोहन सरकार को इनके हश्र का पता नहीं था, जो विधेयक लेकर फिर से हाजिर हो गई।
शायद उन्हें राजनीतिक तापमान का कुछ अनुमान जरूर था, तभी सरकार के अंतिम वर्ष में राज्यसभा के आखिरी दिन इसे पेश करने का जोखिम उठाया गया। इससे विधेयक पास भले न हो, पर कम से कम भविष्य के लिए जिंदा तो रहेगा, क्योंकि राज्यसभा स्थायी सदन है। यदि चुनाव समय पर हुए, तो अभी सरकार के पास पूरे दो सत्र बचे हुए हैं जिसमें इस पर पर्याप्त बहस हो सकती है और थोड़े-बहुत संशोधनों के जरिये न्यूनतम आम सहमति बनायी जा सकती है। यह देखकर आश्चर्य होता है कि जिस मुद्दे पर कांग्रेस, भाजपा और कम्युनिस्ट तक एकमत हों उसके विधेयक को सदन में पेश करने तक के लाले पड़े हैं। इससे कहीं न कहीं इस आशंका को बल मिलता है कि ‘समर्थन’ का दिखावा भी एक छलावा ही है।
प्राय: सभी पार्टियों के सांसदों को यह डर है कि यदि सचमुच एक तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो र्गई, तो सदन का हर तीसरा सांसद बेरोजगार हो जाएगा। यही व्यक्तिगत डर हर पार्टी के भीतर इस विधेयक के विरुद्ध ‘किंतु-परंतु’ का माहौल बनाए हुए है। ऐसे में जब इसके मौजूदा स्वरूप को लेकर सामाजिक न्याय की तथाकथित ताकतें हंगामा खड़ा करने की कोशिश करती हैं, तो हर तरफ राहत महसूस की जाती है और इसको बहाना बनाकर पूरे मामले को ठंडे बस्ते में डालने का रास्ता आसान हो जाता है।
आरक्षण के भीतर आरक्षण की शर्त लगाने वाले पिछड़े समुदाय के नेता भी यह अच्छी तरह जानते हैं कि अभी सदन के भीतर उनके समुदायों का प्रतिनिधित्व लगभग बयालीस प्रतिशत के जिस मुकाम पर पहुंचा हुआ है वह बिना किसी राजनीतिक आरक्षण के है। इसलिए उनकी महिलाएं भी पर्याप्त संख्या में संसद में पहुंचने के लिए आरक्षण के भीतर आरक्षण की बजाय अपने समुदाय के संख्या बल पर भरोसा कर सकती हैं।
यह सही है कि महिला आरक्षण से संसद का ही नहीं, देश की असहनीय हो चुकी राजनीति का चरित्र भी बुनियादी रूप से बदल जाएगा। इससे शालीनता बढ़ने और भ्रष्टाचार व अपराधीकरण जैसी प्रवृत्तियों के कम होने की आशा की जा सकती है। अब तक पंचायत, नौकरशाही और विभिन्न प्रोफेशन में महिलाओं के प्रदर्शन यह भरोसा जगाते हैं कि यदि उन्हें राजनीति में भी अवसर मिले, तो निश्चय ही वे पुरुषों के मुकाबले अपेक्षाकृत बेहतर करेंगी।