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सांसदों के आचरण पर सवाल

लोकसभा के 32 सदस्यों के ‘अमर्यादित आचरण’ का मसला विशेषाधिकार समिति को सौंपे जाने का संकट स्पीकर सोमनाथ चटर्जी द्वारा सोमवार को सदन के स्थगन से ठीक पहले वापस लेने की घोषणा से भले ही टल गया हो, लेकिन इसने जो मुद्दे उठाए वे अभी भी बाकी हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं है कि बेलगाम सांसदों द्वारा बार-बार सदन की मर्यादा भंग करना लोकतांत्रिक भावना के खिलाफ है और इससे लोगों का हमारे अति-कृपालु प्रकार के लोकतंत्र पर भरोसा डगमगाने लगा है। शोरगुल मचाने वाले इन सांसदों को अनुशासित करना और उनमें जवाबदेही की भावना बढ़ाना जरूरी है।

लेकिन इस तरह की कोई भी कार्रवाई न सिर्फ उचित और निष्पक्ष होनी चाहिए, वरन ऐसी दिखनी भी चाहिए। इस पैमाने पर स्पीकर की कार्रवाई शायद खरी नहीं उतरती क्योंकि उन्होंने जिन ३२ सांसदों के नाम समिति को सौंपने की बात कही थी, वे सभी एनडीए के सदस्य हैं और एक बसपा का सदस्य है, जिसकी पार्टी मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों के लिहाज से विरोधी खेमे में है।

विपक्ष के कुछ नेताओं ने दबी जुबान से दावा किया है कि स्पीकर ने वाम दलों और समाजवादी पार्टी के सदस्यों का कोई संज्ञान नहीं लिया, जो सदन में अक्सर शोर मचाते हैं। लोकसभा स्पीकर बनने से पहले चटर्जी के माकपा नेता होने के नाते पक्षपात के आरोप को सही मानने वाले भी काफी हैं।

अपने इस निर्णय को वापस लेकर लोकसभा स्पीकर ने भले ही ठीक किया हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भविष्य में सदस्यों के अमर्यादित आचरण का संज्ञान नहीं लिया जाना चाहिए।

स्पीकर ने यह कदम किशोर चंद्र देव की अध्यक्षता में बनी लोकसभा समिति द्वारा संसद में सदस्यों के अमर्यादित आचरण के खिलाफ सजाओं की अनुशंसाओं के बाद उठाया। लोकसभा समिति ने चार तरह की सजाओं की अनुशंसा की: र्दुव्‍यवहार के दोषी पाए गए सदस्य को चेतावनी, डांट-फटकार, कुछ समय के लिए सदन से निलंबन और निष्कासित करना।

यह भी एक विडंबना है कि जब इस पैनल की अनुशंसाओं से संबंधित प्रश्नावली सदस्यों को दी गई, तो 60 में से सिर्फ 6 ने प्रतिक्रिया दी। इससे पता चलता है कि संसदीय प्रणाली में किस हद तक उदासीनता और संवेदनहीनता घर कर चुकी है।

संसद की कार्यवाही में बार-बार अवरोध आने से परेशान लोकसभा अध्यक्ष ने हाल ही में एक समारोह में कहा कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की साख अभूतपूर्व ढंग से गिर चुकी है। चटर्जी के मुताबिक पारंपरिक संसदीय मूल्यों में कमी आने, अवरोध, अव्यवस्था और कुर्सी की अवमानना की व्यापक तौर पर निंदा हो रही है। उन्होंने आगे कहा- ‘सदन की कार्यवाही में बार-बार बाधा पड़ने से काफी वक्त बर्बाद होता है, जो ग्यारहवीं लोकसभा के 5 फीसदी से बढ़कर मौजूदा लोकसभा में 21 फीसदी तक पहुंच गया है।’

वर्ष 2007 के दौरान सदन की कार्यवाही में बाधा के चलते सरकारी खजाने के 20 करोड़ रुपए बर्बाद हो गए। साल के दौरान दोनों सदनों में कुल 130 घंटे हो-हल्ला और नारेबाजी की भेंट चढ़ गए। यह जनता का पैसा है और लोग उन प्रतिनिधियों से बेहतर व्यवहार की उम्मीद करते हैं, जिन्हें उन्होंने संसद में भेजा है।

यह कहा जा सकता है कि किसी मसले पर संसद में होने वाली सार्थक बहसें अब दुर्लभ होती जा रही हैं। पिछले हफ्ते, जब भाजपा ने महंगाई के खिलाफ आवाज उठाई तो उसने इस समस्या के प्रति जनता का ध्यान खींचने के लिए संसद के चारों ओर एक मानवीय श्रंखला बनाई। इसने संसद की कार्यवाही को रोक दिया, लेकिन जब स्पीकर ने इस पर चर्चा की मंजूरी दी, तो पार्टी के बड़े नेता यहां कुछ नहीं बोले। यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

सच यह है कि इसके कुछ सदस्यों ने अध्यक्ष द्वारा बार-बार चेतावनी दिए जाने के बावजूद सदन के गर्भगृह में जाकर नारेबाजी की। लेकिन भाजपा नेताओं की इस बात में भी दम है कि इसके लिए सिर्फ एनडीए के सदस्य ही दोषी नहीं हैं। यद्यपि, वे अपने तौर-तरीके नहीं सुधारते, तो ऐसे सदस्यों को फिर कार्रवाई झेलनी पड़ सकती है, चाहे वे किसी भी पार्टी के हों।

मौजूदा 14वीं लोकसभा में सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह रही जब यूपीए सरकार का पहला बजट भाजपा के बहिष्कार के चलते बगैर चर्चा के पारित हो गया।

हालांकि भाजपा के इस तर्क में दम है कि यूपीए सरकार मुद्दों को लेकर आश्चर्यजनक ढंग से उदासीन रवैया अपना रही है। स्वयं प्रधानमंत्री का व्यवहार रहस्यमय है। हाल ही में प्रधानमंत्री कार्यालय पर जहाजरानी मंत्री बालू के पुत्र के पक्ष में पेट्रोलियम मंत्रालय को आठ पत्र लिखने का आरोप लगाए जाने के बाद इस संबंध में प्रधानमंत्री से सदन में वक्तव्य की मांग की गई, लेकिन मनमोहन सिंह ने ऐसा नहीं किया। काफी हाय-तौबा के बाद, उन्होंने अपने मंत्री मुरली देवड़ा को आगे कर दिया लेकिन खुद कोई वक्तव्य नहीं दिया। ऐसा मनमोहन ही कर सकते हैं।

अमेरिका के साथ असैन्य परमाणु करार के मसले पर भी कांग्रेस ने विपक्ष की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा की अनदेखी की, जबकि अंतराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी से इस संबंध में अपनी सारी बातचीत पर वह माकपा तथा भाकपा से सहमति लेती रहती है। एक समय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से इस बिल को पारित करवाने में मदद की अपील की, लेकिन इसे लालकृष्ण आडवाणी की महत्ता कम करने की सोची-समझी साजिश की तरह देखा गया, जो इस समय विपक्ष के सबसे ताकतवर नेता हैं।

वास्तव में कांग्रेस को भाजपा पर अंगुली उठाने से पहले अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत है। जब भाजपा सत्ता में थी, तो संसद में कांग्रेस का आचरण भी बहुत अच्छा नहीं था। इसने तहलका खुलासे को लेकर संसद की कार्यवाही में बार-बार बाधा डाली और तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्र्नाडीज का लंबे समय तक बॉयकॉट किया। अफसोस तो यह है कि कांग्रेस-नीत विपक्ष ने पब्लिक एकाउंट्स कमेटी की रिपोर्ट पर राज्यसभा के तत्कालीन अध्यक्ष भैरों सिंह शेखावत की व्यवस्था से नाराज होकर उनका बहिष्कार तक किया।

यह सब कहने का आशय यही है कि सासंदों के आचरण में काफी सुधार की गुंजाइश है। यदि स्पीकर ऐसे मामले में पूरी साफगोई और निष्पक्षता बरतते हैं तो उन्हें लोगों का भरपूर समर्थन मिलेगा।





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