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हिरासत में मौत के मामले बढ़े

नई दिल्लीकेंद्र सरकार के तमाम प्रयासों और राज्य सरकारों के दावों के विपरीत पुलिस हिरासत मंे मौत के मामलों मंे इजाफा हो रहा है। पिछले दो सालों में उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और गुजरात समेत अन्य राज्यों में इस तरह की मौत के 306 मामले सामने आए हैं। 2006-07 मंे देशभर में 118 हिरासती मौतें हुई थीं, जबकि 2007-08 मंे यह संख्या बढ़कर 188 पर पहुंच गई। गृह मंत्रालय को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग द्वारा भेजे गए आंकड़ों में भी इन बातों का खुलासा हुआ है।

आयोग के अनुसार, एक गंभीर तथ्य यह भी है कि हिरासती मौतों को लेकर मानवाधिकार आयोग द्वारा जारी किए गए निर्देशों का पुलिस और राज्य सरकारों ने समुचित पालन नहीं किया है। हालांकि आयोग इन निर्देशों के पालन के लिए समय-समय पर राज्यों को लिखता भी रहा है।

कुछ राज्यों में संख्या शून्य :

देशभर में केवल पुडुचेरी, लक्षद्वीप, दमन दीव, दादरा नगर हवेली, अंडमान निकोबार, नगालैंड, मिजोरम, मणिपुर और गोवा ही ऐसे चुनिंदा राज्य व केंद्र शासित प्रदेश हैं, जहां बीते दो वर्र्षो में हिरासत में मौत का एक भी मामला सामने नहीं आया है।

कुछ प्रमुख राज्यों के आंकड़े :

राज्य 2006-07 2007-08

उप्र 11 32

महाराष्ट्र 21 25

गुजरात 07 16

छग 03 03

झारखंड 03 03

मप्र 10 10

दिल्ली दोनों वर्र्षो में कुल नौ मामले

आयोग के निर्देश

>>1993 में आयोग द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, हिरासत में मौत के मामलों में आयोग को चौबीस घंटे के भीतर सूचित किया जाना चाहिए।

>>1995 मंे आयोग ने पुलिस हिरासत के अलावा न्यायिक हिरासत में होने वाली मौतों के मामलों की भी सूचना देने को कहा था। आयोग के तत्कालीन चेयरपर्सन ने सभी मुख्यमंत्रियों को ऐसी मौत के मामलों में पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफी कराने के निर्देश दिए थे।

>> आयोग ने 1997 मंे एक मॉडल पोस्टमार्टम नियम बनाया था। सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को इसकी प्रतियां भेजकर आयोग ने कहा था कि हिरासती मौतों के मामले में पोस्टमार्टम इन्हीं नियमों के आधार पर होने चाहिए।

‘राज्य अमूमन निर्देश मानते हैं, लेकिन कई मामलों मंे पुलिस और स्थानीय प्रशासन कोताही बरतते हैं। ऐसे मामलों में संबंधित प्रशासन और राज्य सरकारों को नोटिस भेजे जाते हैं और कई बार कानूनी प्रक्रियाएं शुरू की जाती हैं। जांच में अगर आरोप सही पाए जाते हैं तो राज्य सरकारों को मुआवजा देने के निर्देश भी दिए जाते हैं।’

- मंजुला, प्रवक्ता, मानवाधिकार आयोग





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