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लड़ाकों-लुटेरों से अटी रही छतें

बीकानेर. गर्दभरे आकाश में इठलाती अनगिनत पतंगें और ‘बोय काट्या’ की गूंज के साथ छतों पर चढ़े लोगों का उत्साह बुधवार अलसुबह से ही नजर आने लगा। ‘कहीं आंधी न आ जाए’ यह आशंका जहां बलवती रही वहीं इसी आशंका के मद्देनजर हर क्षण का पूरा आनंद उठाने के लिए पतंगबाज छतों पर डटे रहे।

भोर की पहली किरण के साथ ही बुधवार को बीकानेर के आसमान में पतंगों की सर-सराहट शुरू हो गई। छह बजते-बजते आकाश पतंगों से भर गया। हालांकि गर्द छाई थी और हवा कुछ तेज रही मगर पतंगबाजी के लिए यह मौसम कमोबेश ठीक था वहीं पिछली शाम आई आंधी जैसे हालात फिर हों उससे पहले ही जमकर पतंगबाजी कर ली जाए, इस विचार के साथ ही लोग डटे रहे।

कहीं छतों पर लाउड स्पीकर से ‘बोय काट्या’ गूंज रहा था तो कहीं पतंग कटवाने वाले को ‘थारै नाकड़ ऊपर घूम रैयो घूमाड़ करै..’ कहते हुए ललकारा जा रहा था। सुबह से धूप चढ़ने तक जहां लगभग हर छत पर लड़के-लड़कियां और पुरुष पतंग उड़ाते नजर आए वहीं दोपहर में कुछ छतों पर ग्रुपों में लोग जमा हो गए और शुरू हो गई लड़तें। दो ग्रुपों के बीच चलती इस लड़तों में हार-जीत किसी की भी हो जोश एक-सा ही नजर आया।

पतंग उड़ाने के शौकीनों के साथ ही छतों पर लूटने वालों की भी कमी नहीं थी। हाथ में लंबे बांस और उस पर लगी कीकर की तड़ी लहराते हुए लुटेरे आस-पास की दूसरी छतों पर जाती पतंगों को भी उठाकर अपनी ओर खींचते रहे। जो पतंग खुद की ओर आती न दिखे तब ‘ले ù ù ù ले ù ù ù ले ù ù ù’ का शोर उठता। कभी ‘गÝी में किन्नौ’ की टेर लगती तो कभी ‘भूतण ले, डंडल ले, मकड़ल ले..’ जैसी आवाजें गूंज उठती।

दोपहर को छतों पर ही गोठों के दौर भी चलते रहे। किसी छत पर लस्सी बन रही थी तो कहीं नींबू की शिकंजी और शर्बत के साथ धूप का सामना किया जा रहा था। पतंगों की दुकानों पर बुधवार को भी भीड़ लगी रही। मंगलवार की अपेक्षा हवा का रुखा थोड़ा ठीक पाकर लोग सुबह से ही खरीदारी करने पहुंच गए, जो देर रात तक चलती रही।





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