इंदौर.
आज और अभी से यह ठान लो तुम। दुनिया के इस झूठे सच को जान लो तुम। दूसरों पर और निर्भर न रहो। अपने आप को पहचान लो तुम..
जज्बे से भरी ये पंक्तियां लिखी हैं सेंट पॉल स्कूल के नौवीं के छात्र 14 वर्षीय अंशुमन दुबे ने। शरीर ने साथ छोड़ दिया लेकिन हौसले के सहारे वह न केवल रचनाओं का संसार गढ़ रहा है बल्कि राइटर की मदद से परीक्षा देकर कक्षा में अव्वल भी आ रहा है।
रेडियो कॉलोनी निवासी अंशुमन छह साल से ‘मस्क्यूलर एट्राफी’ से पीड़ित है। लाखों में एक को होने वाली इस बीमारी में मांसपेशियां काम नहीं कर पाती और उठना-बैठना ही मुश्किल हो जाता है। अंशुमन का चलना-फिरना तो पहले ही बंद हो गया था। गणित में 100 में से 99 अंक हासिल किए।
इलाज कर रहे गंगाराम अस्पताल, दिल्ली के डॉ. सी.एस. अग्रवाल बताते हैं अभी जांचें चल रही हैं। सारी रिपोर्ट पॉजीटिव नहीं आई हैं। बच्च अपने पैरों पर खड़ा हो जाएगा तो मुझे सबसे ज्यादा खुशी होगी।
नौ साल से उसकी अंग्रेजी शिक्षिका कंवलजीत टूटेजा बताती हैं उसका जज्बा हारे हुए शरीर को हर बार मात दे रहा है। मैंने कुछ साल पहले तक उसे खेलते-कूदते देखा है। लिखावट तो इतनी सुंदर थी कि आज भी आंखों के सामने आ जाती है। इतना होने के बाद भी जिंदगी के प्रति उसका हौसला आश्चर्यचकित करने वाला है। पिछले साल भी हाथ ठीक से नहीं चल पा रहे थे लेकिन परीक्षा खुद ही दी। प्राचार्य ने उसके लिए कुछ समय जरूर बढ़ाया था।
हमें भी ढाढस बंधाता है
पिता आशु दुबे ने बताया आठ साल की उम्र में उसे तेज बुखार आया और यह बीमारी लग गई, जो लाइलाज है। जब भी उसके बारे में सोचकर उदास होते हैं तो वही तसल्ली देता है। मां मनीषा दुबे बताती हैं उसका दिमाग और नर्व सिस्टम पूरी तरह ठीक है लेकिन हाथ-पैर काम नहीं करते।
‘सॉफ्टवेअर इंजीनियर बनूंगा’
अंशुमन कहता है- मेरा विश्वास है एक दिन अपने पैरों पर खड़ा होऊं गा और सॉफ्टवेअर इंजीनियर बनूंगा। किक्रेट और शतरंज उसके पसंदीदा खेल हैं।
चुटकियों में हल कर देता है सवाल
दोस्त उज्ज्वल पवार बताता है स्कूल में भी सभी प्रार्थना करते हैं कि वह ठीक हो जाए। मैं उसके घर जाकर पढ़ता हूं। गणित के कई सवाल तो वह चुटकियों में समझा देता है। भाई हर्ष उसकी बोली कविताएं लिख देता है। उसने अब तक 16 कविताएं लिखी हैं। कम्प्यूटर का भी वह मास्टर है।