आलेख.
राज ठाकरे ने उत्तर भारतीयों के खिलाफ फिर आग उगलना शुरू कर दिया है। देखा जाए तो राज को उत्तर भारतीयों की मेहनत-मजदूरी से ऐतराज अचानक नहीं हुआ। यह तो बाल ठाकरे की लगाई आग थी, जिसे राज ने अचानक भड़का दिया। मुंबई में नौकरीपेशा मध्यमवर्ग में भी (सरकारी नहीं) ये विभाजक रेखा ‘आपला मानुस’ और ‘भैया’ में काफी हद तक फर्क करती है।
वे साधनहीन, मेहनतकश उत्तर भारतीय ‘भैया’ लोग जिनके झुग्गियों में अत्यल्प साधनों में रहने पर भी राज ठाकरे जैसे नेताओं और आपले शहर, में रहने वाले मराठियों का अस्तित्व इतना खतरे में पड़ गया है कि सामने वाले को मैदान से हटाना ही जरूरी है, एक विचित्र राजनीति के शिकार हैं।
‘सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट’ के सिद्धांत के अनुसार जो भी जीव भौगोलिक, सामाजिक परिस्थितियों के हिसाब से स्वयं को ढाल लेता है, वही कालांतर में अपने अस्तित्व को बचाए रखता है। डायनासोर इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। इतने विशालकाय जीव होते हुए भी वे लुप्त हो गए।
इन बेचारे प्राणियों के पास राज ठाकरे जैसा नेता नहीं था, नहीं तो चींटियों का अस्तित्व मिटाकर डायनासोरों को बचा लिया जाता। राज ठाकरे ने शायद दर्शनशास्त्र नहीं पढ़ा और न ही साहित्य पढ़ा है। अगर उन्होंने पढ़ा होता तो वे जानते कि तूफानों में ऊंचे-ऊंचे दरख्त गिर जाते हैं, किंतु घास के तिनकों का अस्तित्व ऐसे कई तूफानों को झेलकर भी शेष रह जाता है।
राज ठाकरे को शुक्रगुजार होना चाहिए कि ये इस देश का लोकतंत्र ही है जिसने उन जैसे असहिष्णु, अपरिपक्व, असंवेदनशील व्यक्ति को भी राज करने का सपना देखने और उसे किसी भी रास्ते से पूरा करने की स्वच्छंदता दी है। वरना जिस राजतंत्र को कोसते हैं हम उसमें राज करने के लिए जुझारू, विद्वान, सहिष्णु और संवेदनशील होना आवश्यक था।
उत्तर भारतीयों पर ऐतराज करने वाले राज को शायद पता नहीं है कि किसी भी आगंतुक का स्वागत मुंबई ने बांहें फैलाकर नहीं किया। मुंबई ने न तो बाहर से आए किसी व्यक्ति को सत्ता की कुर्सी दी, न ही मुफ्त बसेरा या व्यवसाय दिया। उत्तर भारतीय जहां भी जमे हैं, अपने जीवट और मेहनत से जमे हैं। मुंबई ने उनके साथ कोई रियायत नहीं की। इतनी साधनहीन जिंदगी जीकर यदि उत्तर भारतीय किसी दूसरे प्रदेश में जाकर इतने महत्वपूर्ण हो जाते हैं, तो किसी को भी उनके अस्तित्व पर गर्व होना चाहिए।
जो लोग इसे अपने देश, अपने शहर में रहते हुए अपनी अस्मिता को संकट में मानने लगे हैं, उनके जीवट पर शंका होनी लाजिमी है। अपने देश, प्रदेश, शहर में रहने से बड़ा सुख-सुविधा, सहूलियत कोई नहीं होती। अपने देश में रहने पर छठ पूजा के लिए गंगा को ढूंढ़ना नहीं पड़ता। महाराष्ट्र में जो कुछ हो रहा है, ऐसा किसी भी भारतीय के साथ विदेशों में भी नहीं होता। भारतीयों ने तो मारीशस जैसे सात समंदर पार भी देश में भी संस्कृति को इन्हीं छोटी-छोटी पूजा-पाठों, त्यौहारों से बचाकर रखा।
कुछ सवाल हैं जो राज ठाकरे से पूछना चाहिए। पहला, बेरोजगारी केवल महाराष्ट्र में नहीं पूरे देश में है, ऐसे में अकेले महाराष्ट्रियन कैसे प्रताड़ित हो गए? राज ठाकरे को बहुत दुआएं मिलतीं, यदि वे उत्तर भारतीयों के इतने विशाल मात्रा में महाराष्ट्र आगमन के कारणों की खोज और उनका निदान करने का उपक्रम करते।
दूसरा सवाल है कि सार्वजनिक मंच से बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन पर आरोप लगाने से पूर्व अमिताभ से सफाई क्यों नहीं मांगी गई, या उनका मकसद सिर्फ सार्वजनिक मंच पर चर्चा में आना था? तीसरा सवाल, पिछले दिनों महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ताओं को इतने उत्पात करने की छूट क्यों दी गई? चौथा सवाल देश के नीति नियंताओं से है कि इतना सब हो जाने पर भी राज ठाकरे या उनके पार्टी कार्यकर्ताओं पर किसी तरह की कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
अंत में कुछ उदाहरण: संजय दत्त को उनके गुनाह की सजा सुनाई गई, जमानत महीनों में दी गई।
मध्यप्रदेश में प्रोफेसर सभरवाल कांड में मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा है। फिर महाराष्ट्र सरकार कैसे हजारों लोगों को डराने-धमकाने वाले राज ठाकरे और उनके कार्यकर्ताओं को बिना सजा दिए छोड़ सकती है? क्या किसी पार्टी की नैतिकताएं भी स्थान-स्थान के हिसाब से अलग-अलग हो सकती हैं? क्या ऐसी संकीर्ण सोच वाले व्यक्ति की पार्टी की मान्यता चुनाव आयोग समाप्त नहीं कर सकता?