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तिब्बत पर नई पहल जरूरी

दृष्टिकोण. dalai हाथ आए अवसरों का लाभ उठाने से कतराने वाली और जोखिम से डरने वाली विदेश नीति किसी भी देश के हित में मददगार साबित नहीं हो सकती। चीन के खिलाफ तिब्बत में सुलगी विद्रोह की आग की लपटें तिब्बती मूल के दूसरे इलाकों तक फैल गई हैं।

इस विद्रोह ने भारत को दुनिया के दो सबसे ज्यादा आबादी बाले देशों के बीच मतभेद के सबसे महत्वपूर्ण मसले को उठाने का दैवीय संयोग उपलब्ध करा दिया। दुनिया तो हारी हुई बाजी की तरह तिब्बत के मसले को भूल ही चुकी थी। यद्यपि आज चीनी शासन के खिलाफ उठे तिब्बतियों के जबरदस्त विद्रोह के चलते तिब्बत वापस अंतरराष्ट्रीय जगत की सुर्खियों में आ गया है।

चीन को भीतर ही भीरत परेशान करने वाले, उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि को बट्टा लगाने वाले और बीजिंग ओलिंपिक पर काले साए की तरह मंडराने वाले इस मसले ने भारत को ऐसे आक्रामक देश पर हावी होने का अवसर उपलब्ध कराया है जो अक्साई चिन पर कब्जा करने के साथ और भी भारतीय भू-भाग पर अपना दावा जताता है।

वास्तव में बीसवीं शताब्दी की किसी भी घटना ने भारत की सुरक्षा व्यवस्था पर इतना प्रतिकूल असर नहीं डाला, जितना कि तिब्बत के पतन ने। इसके चलते इतिहास में पहली बार चीनी हान फौजें भारतीय सीमाओं तक आ र्गई। 1962 तक भारत केवल खैबर र्दे की दिशा से ही सेनाओं के आक्रमण झेलता रहा था, पर चीन के भारतीय अधिकार क्षेत्र में लगातार दखल देने की कोशिशों के चलते यह अपनी शांत हिमालयीन सीमाओं पर भी सेना की टुकड़ियां रखने पर विवश है।

हाल ही में लोकसभा में सरकार ने खुद यह स्वीकार किया कि पिछले ‘तीन सालों’ में चीनी सेनाओं की ‘लगातार सीमापार से गतिविधियां’ जारी रहीं। भारत के साथ सीमा के मसले पर चीन अपनी स्थिति साफ करने से इनकार करता ही है, इसके अलावा उसने तिब्बत में अपनी सैन्य क्षमताओं में अनाप-शनाप बढ़ोतरी की है।

इतना ही नहीं, यह अपने क्षेत्र से बहने वाली नदियों पर बांध बनाकर पानी को राजनीतिक औजार की तरह इस्तेमाल करने की कपटपूर्ण भावना भी रखता है। जहां तक पश्चिम की बात है तो उसके लिए तिब्बत महज एक प्रतीकात्मक मसला है। लेकिन तिब्बत की सुरक्षा और स्वायत्तता से भारत के अपने हित जुड़े हैं।

यदि ‘दुनिया की छत’ कहा जाने वाला यह हिस्सा सुलग रहा हो, तो क्या हमारे हित सुरक्षित रह सकते हैं? तिब्बत की समस्या को ‘सुलझाने’ की चीन की ऐसी कपटपूर्ण नीतियां हैं कि आधा तिब्बती पठार और 60 फीसदी तिब्बती आबादी राजनीतिक तौर पर पुनर्गठित तिब्बत से बाहर है।

कटे-छंटे तिब्बत में चीन द्वारा तिब्बती मूल के लोगों को खदेड़ते हुए अपने हान मूल के लोगों को घुसेड़ने के प्रयास जिस तरह लगातार जारी हैं, उससे भारतीय सुरक्षा को खतरा पैदा हो गया है। तिब्बत में तिब्बतियों का होना भारत की सामरिक पूंजी है: वे भारत के खिलाफ चीन का साथ नहीं देंगे, कुछ हद तक इसलिए क्योंकि दलाई लामा और उनकी निर्वासित सरकार का मुख्यालय धर्मशाला में है।

कड़वी सचाई यही है कि चीन, न सिर्फ तिब्बतबल्कि अन्य क्षेत्रों के संदर्भ में अपने दावों और महत्वाकांक्षाओं को तर्कसंगत ठहराने के लिए सुधारवादी इतिहास का सहारा लेता है। वह इस बात से संतुष्ट नहीं है कि चीनी शासन की क्षेत्रीय ताकत आज अपने चरम पर है। बीजिंग और भी ताकतवर चीन को देखना चाहता है।

चीन खुले तौर पर क्षेत्रीय राष्ट्रवाद को हवा देता है। तिब्बत और ताइवान जैसे मसले तो इसके केंद्र में हैं ही, यह पूर्व और दक्षिणी चीन सागर पर दावा ठोकने के अलावा भारत के अरुणाचल प्रदेश, जो ताइवान के आकार से लगभग तीन गुना है, पर भी कब्जा जताता है। अपने देश की लोककथाओं के मुताबिक चीन समस्त नागरिक सभ्यताओं का जन्मदाता होने का दावा भी करता है।

इसका नेतृत्व देश में अति-राष्ट्रवादी राजनीतिक संस्कृति विकसित करने के लिए किंवदंती को इतिहास के साथ मिलाकर अपने यहां हो रहे व्यापक बदलावों को अनदेखा करते हुए हुए अभी भी विरासत में मिले लोकाचारों को अपना रहा है।

आज जबकि ओलिंपिक की वजह से तिब्बत पर दुनिया का ध्यान लगा रहेगा, भारतीय राजनय तिब्बत को उसके उचित स्थान पर यानी भारत-चीन के रिश्ते के केंद्र में नहीं लाता, तो शायद ऐसा अवसर उसे फिर नहीं मिलेगा। क्या नई दिल्ली तब तक इंतजार कर सकती है, जब तक कि चीन ब्रrापुत्र के पानी का प्रवाह सूखी येलो रिवर की ओर मोड़ना शुरू नहीं कर देता, या धरातल पर फेरबदल करते हुए तिब्बत को चीनमय नहीं कर देता? लेकिन अब तक तो भारत तिब्बत के शांत बौद्धिक संस्कृति वाले इलाके में चीन की निर्मम कार्रवाइयों का मूकदर्शक बना बैठा है।

अब समय आ गया है कि भारत अपनी नीति में लोच लाते हुए चीन और तिब्बत के मध्य सार्थक बातचीत की मांग करे और बीजिंग से तिब्बत में मेल-मिलाप और शांति की प्रक्रिया शुरू करने को कहे जो दलाई लामा को अपने लंबे निर्वासन से वापस लाने में मदद कर सके। इसके साथ-साथ भारत बीजिंग से कहे कि वह भारतीय-अधिकार क्षेत्र के इलाकों पर अपना दावा त्यागते हुए स्थायी द्विपक्षीय संबंध बनाने में मदद करे।

चीन की भारतीय इलाकों पर अपना कब्जा जताते हुए 1962 के अपने अधूरे काम को पूरा करने की चाहत उस सृजनात्मक भावना के खिलाफ है जो पड़ोसियों के बेहतर संबंध के लिए जरूरी है। चीन का यह दावा कि इन भारतीय इलाकों की तिब्बत से ऐतिहासिक संधियां रही हैं, इस लिहाज से वे उनके अधिकार क्षेत्र में आते हैं, पूरी तरह से अतीत की सोच से प्रेरित लगता है।

नई दिल्ली के लिए यही उपयुक्त समय है कि वह अपनी एकीकृत-चीन की मान्यता से हटे बगैर अपनी शब्दावली में थोड़ा सा परिवर्तन करते हुए ‘भारत-तिब्बत सीमा’ का इस्तेमाल करते हुए अपने नक्शे में हिमालय के उत्तरी भाग को तिब्बत के रूप में दर्शाने लगे। ऐसा करके भारत बगैर कुछ कहे तिब्बत को एक असाधारण मसले की तरह फिर से उठा सकता है, जिससे चीन और तिब्बत के सच्चे प्रतिनिधियों के मध्य समझौते की राह खुले।

जब-जब चीन नई दिल्ली पर निर्वासित तिब्बतियों की गतिविधियों को नियंत्रित करने लिए दबाव डालता है, भारत को शिष्टतापूर्वक उसे यह समझाना चाहिए कि तिब्बत में अमन और शांति की प्रक्रिया चालू करना खुद उसके तथा भारत-चीन संबंधों के स्थायी हित में होगा। इसके साथ-साथ भारत को अपने सहयोगी बुजुर्ग दलाई लामा के बाद के परिदृश्य के लिए भी तैयार रहना चाहिए।

लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।





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