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बड़े शहरों की छोटी नेतागीरी

संपादकीय. भारत जैसे बहुधर्मी, बहुनस्ली और आर्थिक असमानताओं से भरे देश में यह बहुत आसान है कि किसी क्षेत्र विशेष की जनता की दिक्कतों और तकलीफों के लिए किसी दूसरे क्षेत्र के लोगों को जिम्मेदार ठहरा दिया जाए और घृणा की इस गोलबंदी पर राजनीतिक फसल काटी जाए। मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई और पुणो जैसे नगरों के विकास में पूरे देश के योगदान को नजरअंदाज करके उन्हें स्थानीयता के कवच में लपेटना प्रतिगामी ही नहीं, आपत्तिजनक भी है।

आमतौर पर विभिन्नताओं वाले समाज और देश परस्पर निर्भरता और अंतर-योगदान वाले वैकासिक मॉडल पर फलते-फूलते हैं। लोकतांत्रिक पारदर्शिता इसके लिए बेहतर मंच भी उपलब्ध कराती है। दुनिया के तमाम विकसित और समृद्ध नगर इस बात के प्रमाण हैं। इसलिए भूमंडलीकरण और ज्ञानमूलक समाज के दौर में किसी भी नेता को यह छूट नहीं दी जा सकती कि वह विकास के रास्ते में अवरोध का पहाड़ बनकर खड़ा हो जाए।

दो महीने की पाबंदी से निकलते ही राज ठाकरे ने उत्तर भारतीयों को निशाना बनाने की अपनी अलगाववादी राजनीति फिर शुरू कर दी। मुंबई या महाराष्ट्र में रहने वाले उत्तर भारतीय अपनी परिपक्वता दिखाते हुए उनके वक्तव्यों पर कोई उत्तेजक प्रतिक्रिया देने से बच रहे हैं। लेकिन महाराष्ट्र की विलासराव देशमुख सरकार राज को कानूनी पेंचों से बचाने के लिए उनके आपत्तिजनक वक्तव्यों की ‘सत्यता’ को जांच के ठंडे बस्ते में डालने का बहाना बना रही है।

जो बयान पूरे मीडिया में प्रचारित हुए और टेलीविजन के पर्दे पर जीवंत रूप से प्रसारित हुए और जिनका ‘संदेश’ सारे देश को समझ में आ गया, वह सरकार को समझ में नहीं आया।

इससे यह संदेह होता है कि राज जो कुछ कर रहे हैं, उसे कहीं न कहीं सरकार का भी परोक्ष समर्थन भी हासिल है। क्षेत्रीय पार्टियों और उनके नेताओं के स्वार्थी अवसरवाद और राजनीतिक विवशताओं को समझा जा सकता है, पर राष्ट्रीय दलों द्वारा चलाई जा रही सरकारों का वैसा रुख समझ से परे है। राष्ट्रीय पार्टियों का यह नैतिक ही नहीं भौतिक दायित्व भी है कि वे देश में पैदा होने वाली विभेदनकारी प्रवृत्तियों को हतोत्साहित करें।

यह विरोधाभास है कि जैसे-जैसे अंतरराष्ट्रीय निवेश व बड़ी योजनाओं के चलते हमारे महानगरों को दुनिया के अन्य बड़े शहरों के मुकाबले खड़ा करने की कोशिशें चल रही हैं, वैसे-वैसे इन शहरों के नेता अपनी सोच और संकीर्ण बनाते जा रहे हैं। क्या वैश्वीकरण की यह अनोखी भारतीय शैली है?





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