लंदन.
क्रिकेट मूलत: बल्ले और गेंद का खेल है और इनसे छेड़छाड़ मेरीलीबोर्न क्रिकेट क्लब (एमसीसी) को मंजूर नहीं है। एमसीसी ने बुधवार को मीटिंग करके बल्ले के परंपरागत स्वरूप को बचाए रखने पर अपनी मुहर लगाई। इसके लिए बल्ले से संबंधित नियम में बदलाव करने का निर्णय भी लिया गया। इसके अनुसार बल्ले में लकड़ी, बांस और रबर के अतिरिक्त किसी भी तत्व के इस्तेमाल की इजाजत नहीं होगी। माना जा रहा था कि क्लब स्तर खेलने के लिए बल्ले में कार्बन के उपयोग को इजाजत मिल सकती है।
90 फीसदी हिस्सा लकड़ी और बांस का :
एमसीसी के अनुसार बल्ले का 90 फीसदी हिस्सा लकड़ी और बांस का बना होगा। 10 फीसदी हिस्से में रबर और गोंद का इस्तेमाल किया जाएगा। हैंडिल की लंबाई बैट के 52 फीसदी से अधिक नहीं होगी। यह नियम इस साल एक अक्टूबर से लागू होगा। इससे पहले बल्ले के मूल स्वरूप के बारे में स्पष्ट नियम नहीं था, जिससे बल्ला कंपनियां कई बार इसमें कार्बन का उपयोग करती थीं।
99 फीसदी सदस्यों ने दी सहमति :
एमसीसी की जनरल मीटिंग में नए नियम को दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता थी। उम्मीद से अधिक इसे 99 फीसदी सदस्यों का समर्थन मिला। मीटिंग में आईसीसी, दुनिया के बल्ला निर्माता कंपनियों के प्रतिनिधि, तकनीकी विशेषज्ञों से सलाह मशविरा किया गया।
‘ताकि मिस टाइम शॉट छक्का न हो’ :
एमसीसी प्रमुख जान स्टीफेंसन ने मीटिंग के बाद कि वर्तमान में कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि बल्लेबाज का मिसटाइम शॉट भी बाउंड्री से बाहर चला जाता है। एमसीसी की कोशिश है कि बल्ले की अतिरिक्त शक्ति से ऐसा न हो। आखिर बल्ले और गेंद के मुकाबले में यदि कोई भारी पड़ता है तो खेल का मजा कम हो सकता है।