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सवाल आरक्षण का नहीं, नीयत और व्यावहारिकता का है

अभिमत. इसमें कहीं भी दो मत नहीं हैं कि हमारे सामने सवाल असमानताओं की समाप्ति का है। लेकिन हमारे परिवेश में मुख्य संकट अवधारणा को लेकर है। हमारे लक्ष्य आसमान पर होते हैं और आंख मछली की आंख पर टिकी होती है। जब भी वर्गहीन, जातिविहीन एवं समाजवादी व्यवस्था की बात होती है, हम मूल मुद्दे को मुखौटे की तरह प्रयोग करते हैं और हमारा हर निर्णय वोट-बैंक पर केंद्रित होता है। यह सही है कि वर्ण-व्यवस्था ने हमारे भारतीय समाज में जातिगत एवं वर्गगत विभाजन की ऐसी दरारें पैदा कीं, जिन्हें पाटने में पूरे तंत्र की मशक्कत दरकार थी। आरक्षण की व्यवस्था इसी का एक अंग थी। ब्रिटिश काल में भी आरक्षण का प्रावधान, विधानमंडलों में व सरकारी नौकरियों में मौजूद था। 1950 में विधिवत आरक्षण का सिलसिला शुरू हुआ। प्रारंभिक रूप में आरक्षण प्रणाली सिर्फ 10 वर्ष के लिए थी। मगर हर पुनरीक्षण में पाया गया कि इस प्रणाली को अभी जारी रखना होगा।

1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने जब मंडल आयोग की सिफारिशों पर क्रियान्वयन को अपनी राजनीतिक कार्यशैली के एक अमोघ अस्त्र के रूप में प्रयोग किया, तो उसका व्यापक विरोध भी हुआ और समर्थन भी मिला। उस समय प्रश्नचिन्ह मंडल आयोग की सिफारिशों पर नहीं टांगे गए थे, प्रश्नचिन्ह लगे थे प्रधानमंत्री की नीयत पर। यही माना गया कि प्रधानमंत्री ने अपने विरोधियों को हाशिए पर धकेलने के लिए मंडल का प्रयोग किया। बहरहाल, उनके बाद यह सिलसिला अन्य संगठनों ने भी आगे चलाया। राजनीतिक बहस-मुबाहिसे को हाशिए पर सरकाकर, वोट-बैंक के लोभ से मुक्त होकर इस मुद्दे का व्यावहारिक पहलू देखना बेहद जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फैसले में जहां उच्च शिक्षा संस्थानों में ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की अनुमति दी, वहीं इस नीति की प्रभावोत्पादकता पर भी सवाल उठाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह तो स्वीकार किया कि असमानताएं समाप्त होनी चाहिए, लेकिन यह भी टिप्पणी की कि ऐसा नहीं लगता, इस दिशा में गंभीर प्रयास हो रहे हैं। न्यायपालिका ने केंद्रीय कार्यपालिका को यह निर्देश भी दिया है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से लेकर अब तक आरक्षण नीति की उपलब्धियों पर चर्चा होनी चाहिए।

यदि आजादी के छह दशक बाद भी घोषित लक्ष्यों की प्राप्ति नहीं हो पाती है, तो जाहिर है कि स्थिति पर गंभीर संवाद जरूरी है। न्यायपालिका ने इसी संवादशीलता पर बल देते हुए स्पष्ट किया कि ‘कुछेक प्रावधान एक दशक बाद समाप्त होने चाहिए थे, मगर उन्हें जारी रखने का निर्णय लिया गया। इससे ऐसा आभास भी मिलता है कि पिछड़ापन घटने के स्थान पर बढ़ा है, इसलिए जरूरी है कि इस मुद्दे पर खुलकर संवाद हो।’

एक तथ्य यह भी है कि शिक्षा के क्षेत्र में आरक्षण हमारी समस्या का संपूर्ण समाधान नहीं है। यह समाधानों की दिशा में अनेक प्रयासों में से एक प्रयास है। देश के व्यापक हित व समानता लाने के प्रयासों में आरक्षण से मदद मिल सकती है, मगर इससे जन्म के आधार पर विशेष रियायत की बात, मैरिट, गुणवत्ता व वैयक्तिक उपलब्धि को नकारे जाने की आशंकाएं भी उपजती हैं। तमिलनाडु में अन्य प्रदेशों से अधिक आरक्षण का परिणाम यह निकला कि अगड़ी जातियों से पिछड़ी जातियों के स्तर में काफी बेहतरी आई है, लेकिन दूसरी तरफ असंतुलन का एक नया अध्याय खुलने लगा है। वहां कुछेक क्षेत्रों में अगड़ी जातियों को शिक्षा के समान अवसर से वंचित भी होना पड़ा है। भेदभाव का ‘बैक गियर’ अनजाने में ही लग रहा है।

दिक्कत यह नहीं है कि पूर्वाग्रहों से ऊपर उठकर व्यावहारिक समाधान क्या हो? दिक्कत यह है कि किसी भी शर्त पर, किसी भी ढब से सत्ता में बने रहने की ललक अर्थात वोट बैंक की प्राथमिकता ने राजनीतिक दलों व राजनेताओं के सच बोलने पर अघोषित पाबंदी लगा दी है। तुष्टीकरण सवर्णो का हो या पिछड़ों का या फिर अनुसूचित जातियों/जनजातियों का, इसके लिए मैराथन जारी है। अब स्थिति यह आ गई है कि गुर्जर समाज, जाट समुदाय व कुछ क्षेत्रों में ब्राrाण समाज भी आरक्षण की मांग करने लगे हैं। परिणाम यह है कि स्वाधीनता प्राप्ति के 60 वर्ष बाद भी ग्राम चौपालों पर दलितों के प्रवेश आसानी से नहीं होता। समानता व समरसता की मूल अवधारणाएं गायब होने लगी हैं।

दलित वर्गो, पिछड़ी जातियों व अनुसूचित जातियों के आर्थिक अथवा सामाजिक पुनरुत्थान को परिभाषित किया जाना जरूरी है। सिर्फ नारे, चुनावी घोषणापत्र और अपनी सत्ता व प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए बयानबाजी की होड़ ने इस देश में न तो पिछड़ों का भला किया है और न ही संस्कारों अथवा राष्ट्रीय सोच के स्तर में कोई बदलाव आया है। राजनेताओं की वर्तमान पीढ़ी से कोई लंबी-चौड़ी उम्मीद लगाना बेमानी है। बेहतर यही होगा कि नई पीढ़ी के समक्ष यह प्रश्न रखा जाए। इस पर खुले मन से बहस हो और विशुद्ध व्यावहारिक धरातल पर ठोस समय-सीमाबद्ध निर्णय लिए जाएं। आरक्षण दिया जाए या नहीं दिया जाए- दोनों ही स्थितियों में नारेबाज राजनीतिज्ञों का बहिष्कार होना चाहिए। बकौल दुष्यंत, ‘हो गई पीर, पर्वत सी, पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।’

-लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।





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