HomeVichaar Vichaar

यूं ही नहीं महानायक

दृष्टिकोण.यूं ही नहीं बनता कोई महानायक तकरीबन बीस साल पहले ‘इलस्ट्रेटेड वीकली’ का संपादक रहते हुए मैंने एक कवर स्टोरी की थी, जिसका नाम था ‘फिनिश्ड!’ यह संभवत: इकलौती ऐसी स्टोरी है, जिस पर मुझे आज भी अफसोस है। इस वजह से नहीं कि यह तथ्यात्मक तौर पर गलत थी(पत्रकारों को जिसका सबसे ज्यादा भय सताता है) वरन इसलिए कि जिस व्यक्ति के बारे में मैंने लिखा था, वह कोई प्रतिकार किए बगैर चुपचाप अपने कैरियर को फिर से संवारने में जुटा रहा और आखिरकार उसने मुझे गलत साबित कर दिया। इससे मैंने एक महत्वपूर्ण सबक सीखा: कभी किसी को खारिज मत करो।

मैंने जो किया, वह कोई असामान्य बात नहीं थी। पत्रकारों को श्रद्धाजलियां लिखने में मजा आता है; फिर चाहे वे लोगों, ब्रांडों, फिल्मों, कंपनियों और राजनीतिक पार्टियों किसी के भी बारे में हों। इससे हम जैसे लोगों को एक तरह की ताकत का अहसास होता है। हर हफ्ते हम कई फिल्मों को दफना देते हैं। लेकिन हमें उनको दफन करने में सबसे ज्यादा मजा आता है, जिन्हें हम हारा हुआ मानते हैं। रामगोपाल वर्मा ने कुछ ऊल-जुलूल फिल्में बनाईं, हमने उन्हें खारिज कर दिया। रानी मुखर्जी की लगातार दो फिल्में फ्लॉप हुईं, हमने मान लिया कि अब उनमें पहले जैसी बात नहीं रही।

यशराज की पांच फिल्में बॉक्स ऑफिस पर धराशायी हो गईं और हम उनके साठ साल लंबे गौरवशाली इतिहास को नजरअंदाज करते हुए उन्हें उनके तख्त से गिराने में जुट गए। शेयर बाजार के गिरते ही हम इसके पिछले एक दशक के असाधारण प्रदर्शन की अनदेखी करते हुए अपने इनफोसिस के शेयरों के बेचने के लिए तैयार हो जाते हैं। एकता कपूर के तीन धारावाहिक अच्छे नहीं चलते और हम कहना शुरू कर देते हैं कि ‘के’ सीरियल्स का दौर अब खत्म हो गया है; अब रियलिटी शो का जमाना है। हम हमेशा श्रद्धांजलियां लिखने की जल्दी में रहते हैं। मेरे ख्याल से ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम अपने मौजूदा परिवेश के बारे में लिखने की बजाय खुद को भगवान समझते हुए भविष्य का पूर्वानुमान लगाने में ज्यादा उत्सुक होते हैं। इसीलिए हम लोगों के बारे में कहा जाता है कि हम इसीलिए हीरो बनाते हैं, ताकि बाद में उन पर कीचड़ उछाल सकें।

ऐसी कई मिसाल हैं- इंदिरा गांधी, 1971 की हीरो, बांग्लादेश की मुक्तिदाता। 1975 के आपातकाल की खलनायिका। 1977 में संसद से बाहर खदेड़ दी गईं। 1984 में उनकी हत्या हो गई। उनके पुत्र राजीव गांधी, 1984 के हीरो। भारतीय राजनीति का नया क्लीन चेहरा। इतिहास की सबसे बड़ी चुनावी जीत। 1987 में छवि कलंकित, बोफोर्स के खलनायक। 1991 में उनकी हत्या हो गई। जयप्रकाश नारायण, 1975 के हीरो। क्या किसी को याद है कि वे कौन थे? बुद्धदेब भट्टाचार्य, माकपा का सुधारों का समर्थक प्रतिनिधि चेहरा। जिसे देश का नंबर-1 मुख्यमंत्री माना गया। आज, नंदीग्राम और सिंगुर प्रकरण के बाद, उनकी रेटिंग सीधे गिरकर रसातल तक पहुंच गई है। डॉ. विनायक सेन, मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्ता और गरीबों के चिकित्सक। पॉल हैरिसन पुरस्कार विजेता। जॉनाथन मान पुरस्कार विजेता। नक्सलियों से मिलीभगत के आरोप में पिछले एक साल जेल में सड़ रहे हैं। जहां तक रही मीडिया की बात, तो वह आईपीएल में इतना व्यस्त है कि इस केस के लिए उसके पास समय नहीं है।

ऐसे में कोई आश्चर्य की बात नहीं कि अनुराग बसु जैसे एक मामूली व्यक्ति को लगता है कि उसका कद इतना ऊंचा हो गया है कि वह अमिताभ बच्चन के एक्टिंग कैरियर को खारिज कर सके। बसु ने खुद तो कोई खास शोहरत नहीं कमाई और महज दो-तीन फिल्में बनाने के बाद उसे लगता है कि वह इस स्तर तक पहुंच गया है कि ऐसे शख्स के बारे में टिप्पणी कर सकता है जिसने सौ से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया है और जिसे इस दौर के बेहतरीन अभिनेताओं में शुमार किया जाता है। आखिर इसका कारण क्या है? बसु का कहना है कि अमिताभ ने हाल में बहुत सी घटिया फिल्में की हैं। मैं घटिया फिल्मों के बारे में तो नहीं जानता, लेकिन हां, अमिताभ अपने अभिनय का दायरा बढ़ा रहे हैं। यही बात उन्हें इतना रोचक बनाती है। जबकि दूसरे कई हीरो, जो उनसे उम्र में काफी छोटे हैं, उबाऊ हो चुके हैं और उनके अभिनय में भी एकरसता नजर आती है। अमिताभ नई भूमिकाएं, नई चुनौतियों को स्वीकार कर रहे हैं। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। उन्हें चुनौतियां पसंद हैं और महान अभिनताओं से ऐसी ही उम्मीद की जाती है। फिल्में चलती हैं, फिल्में फ्लॉप होती हैं; लेकिन यादगार रोल या ऐसा चरित्र जो साहस और पूर्ण समर्पण से गढ़ा गया हो, हमेशा जीवंत रहता है। राज कपूर की तरह गुरुदत्त की बेहतरीन भूमिकाओं वाली फिल्में भी दुर्भाग्यवश असफल रहीं।

असल में अमिताभ की सबसे बड़ी कामयाबी यही है वे उम्र के ऐसे पड़ाव पर हैं कि बॉलीवुड से मिलने वाली आसान, आम भूमिकाओं को कर आराम से बैठ सकते हैं लेकिन वे अपनी क्षमताओं को जांचने के लिए अक्सर लीक से हटते हुए साहसिक रोल चुनते हैं। हां, ‘आग’ पिट गई। ‘नि:शब्द’ का भी ऐसा ही हश्र हुआ। इसके बावजूद वे रामगोपाल वर्मा के साथ खड़े रहे और ‘सरकार राज’ की। अनिच्छा से नहीं, जैसा दूसरे करते, बल्कि गर्व के साथ। उन्हें ‘लास्ट लियर’ के लिए चुना गया। यह फिल्म यहां रिलीज के इंतजार में है। उन्हें किसी बात से भय नहीं लगता। कोई चीज उन्हें हतोत्साहित नहीं करती। हर असफलता उन्हें और मजबूत बनाती है। क्या आप किसी और के द्वारा ‘बूम’ फिल्म करने की कल्पना कर सकते हैं? उन्होंने ‘कांटे’ की, जिसे देखकर उनके कई मित्र काफी कुढ़ गए, जिनमें से एक ने तो उन्हें इस फिल्म में लेने के लिए मुझे भला-बुरा तक कहा। जहां उन्होंने ‘झूम बराबर झूम’ और ‘कभी अलविदा न कहना’ जैसी फिल्में कीं, वहीं नई साहसिक फिल्मों को भी स्वीकार किया। चाहे वह ‘चीनी कम’ हो, ‘सरकार’ हो, या ‘शू बाइट’।

बसु इन सब बातों को समझने के लिहाज से बहुत छोटे हैं। एक महान और औसत दर्जे के अभिनेता के मध्य यही एक फर्क है कि कौन किस हद तक जोखिम उठा सकता है। महान अभिनेता वह है जो लगातार खुद को चुनौती देता है, जो अपनी गलतियों से नहीं घबराता। जबकि औसत दर्जे का अभिनेता अपने पैसों की गणित में उलझा रहता है और अपनी भूमिकाओं पर अपने सीए के साथ चर्चा करता है। ‘फिनिश्ड!’ लिखते वक्त मैं अमिताभ के इस पहलू से परिचित नहीं था। इसी वजह से मुझे अपने शब्द वापस लेने पड़े। देखते हैं अनुराग बसु कब ऐसा करते हैं।





अपने विचार यहां लिखें
नाम:
ईमेल आईडी:
भाषा चुनॆ
हिन्दी रॊमन‌ हिन्दी फॊनॆटिक English
विचार:
कोड: