जयपुर. राजस्थान हाईकोर्ट ने अध्यापकों के वेतनमान संशोधन नियम 1998 के प्रावधानों को सही ठहराया है। अदालत ने कहा कि पुराने नियमों के तहत नया वेतनमान पाने वाले अध्यापकों को 8 जून, 2001 की अधिसूचना से प्रभावित नहीं माना जा सकता। अदालत ने अध्यापकों को निर्देश दिए कि वे वेतन की कटौती के मामले में राज्य सरकार के समक्ष अपना अभ्यावेदन पेश कर सकते हैं। यह आदेश न्यायाधीश आर.एम.लोढ़ा व आर.एस.राठौड़ की खंडपीठ ने राज्य सरकार की ओर से दायर 63 अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए दिया।
क्या है मामला : राज्य सरकार ने 7 अगस्त,1998 को अध्यापकों के लिए वेतनमान संशोधन नियम 1998 को जारी और इसके तहत अध्यापकों एवं वरिष्ठ अध्यापकों के वेतनमानों को संशोधित करते हुए 6500-10500 रुपए से घटाकर 5500-9000 रुपए कर दिया। इन प्रावधानों को सरकार ने 8 जून, 2001 को अधिसूचना जारी कर प्रभावी रूप से लागू करते हुए आदेश दिए कि 1998 से 2001 के बीच में जिन अध्यापकों को पुराने नियमों के तहत एक वेतन श्रंखला में 10 साल पूरे किए बिना ही नई वेतन श्रंखला मिल गई उनसे बढ़े हुए वेतन की वसूली की जाए।
राज्य सरकार के इस आदेश को चंद्रमोहन एवं अन्य ने चुनौती दी। मामले में सुनवाई करते हुए 4 मई, 2004 को न्यायाीश शिवकुमार शर्मा की एकल पीठ ने दोनों विज्ञप्तियों को निरस्त करते हुए कहा कि पहले मिल चुके परिलाभों को छीना नहीं जा सकता। एकल पीठ के इस आदेश को राज्य सरकार ने खंडपीठ में चुनौती दी। खंडपीठ के समक्ष राज्य सरकार ने जवाब में कहा कि तृतीय वेतन श्रेणी शिक्षकों की सेवा अवधि की गिनती के बारे में कोई प्रावधान नहीं है, इसलिए वेतन में नियमों का संशोधन किया गया है। इस पर अदालत ने राज्य सरकार के वेतनमान संशोधित करने के आदेश को सही ठहराया।