Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood परदे के पीछे
मिथुन चक्रवर्ती के सुपुत्र मिमोह ‘जिमी’ नामक फिल्म में प्रस्तुत हो रहे हैं। नेताओं, सितारों और डॉक्टरों के पुत्र प्राय: अपने पिता के व्यवसाय में जाते हैं। डॉक्टरों को पढ़ाई करनी होती है और पिता के व्यवसाय में होने से उन्हें परीक्षा में कोई खास रियायत नहीं मिलती।
नेता और सितारे अपनी औलादों को किसी तरह मैदान में ले ही आते हैं। आज मिमोह कल्पना नहीं कर सकते कि उनके पिता ने कितना संघर्ष किया है। उसके पास पारंपरिक हीरो का चॉकलेटी चेहरा नहीं था और रंग भी सांवला। उसका नक्सलवाद से भी संबंध रहा है।
मृणाल सेन ने उसे ‘मृगया’ में प्रस्तुत किया और जनजाति का पात्र उसे रास भी आया। राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म के बाद ‘मुंबई के जंगल’ में उसे स्वीकार नहीं किया गया। वह भी जमा रहा और बी सुभाष की फिल्म ‘डिस्को डांसर’ ने उसे सितारा बना दिया। कस्तूरचंद बोकाडिया की फिल्म ‘प्यार झुकता नहीं’ ने उस एक्शन हीरो को पारिवारिक फिल्म का नायक बना दिया।
मिथुन ने तीन शिफ्टों में काम करके दर्जनों फिल्में पूरी कीं और इस धन से ऊटकमंड (ऊटी) में ‘मोनार्क’ नामक होटल बनाया। एक दौर ऐसा भी आया जब मिथुन की दर्जनों फिल्में असफल हो गईं और वह जलते हुए कोयले की तरह माना गया, जिसे कोई हाथ नहीं लगाना चाहता था।
डिस्को किंग बंगलौर चला गया। बीसवीं सदी के आखिरी दशक में सितारे सभी को उपलब्ध नहीं थे। अत: दूसरी श्रेणी के सभी निर्माता मिथुन के पास गए जहां उसने ‘मोनार्क’ में डेरा डाला और ठेके पर फिल्में पूरी करने लगा। इन फिल्मों में अत्यंत कम बजट के कारण निर्माताओं को लाभ हुआ। दरअसल मोनार्क शैली का फिल्म निर्माण अपने लघु आर्थिक समीकरण के कारण सफल हुआ।
मिथुन ने तकनीशियनों को मासिक वेतन पर रखा और फिल्म दर फिल्म के अनुबंध से हटकर काम किया। यूनिट के सारे सदस्य सुबह नौ बजे से शाम सात बजे तक फैक्टरीनुमा अनुशासन की तरह काम करते थे।
मोनार्क शैली की लोकप्रियता के कारण मिथुन ने मद्रास के बड़े फिल्मकार की फिल्म नहीं की, क्योंकि उसे तीन माह मोनार्क से दूर रहना पड़ता। मिथुन को अमिताभ बच्चन के साथ ‘अग्निपथ’ में खूब सराहा गया। अपनी अधिकता के कारण मोनार्क शैली भी असफल हो गई। मिथुन मुंबई लौट आए।
मणिरत्नम की ‘गुरु’ में उन्हें खूब सराहा गया। नक्सलवाद से सितारा होने तक की यात्रा में पूंजीपति ‘मोनार्क’ का मालिक होना भी शामिल है और अब सामंतवादी परंपरा में अपने बेटे को सिंहासन पर आसीन करने का काम किया जा रहा है, क्या यह सच है कि उम्र के एक दौर में कम्यूनिज्म की ओर सहज झुकाव होता है परंतु सुविधा का जीवन मिलते ही मार्क्स की किताबों को ताक पर रखकर भुला दिया जाता है।