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‘हम जिंदगी के हर पल को जीना चाहते हैं। हम इस बात को सोचने में एक पल भी नहीं गंवाना चाहते कि हमारी जिंदगी कितनी है।’ यह बात थैलेसीमिक ऋषि और अलका ने पीजीआई के एडवांस्ड पीडियाट्रिक्स सेंटर में मनाए जा रहे इंटरनेशनल थैलेसीमिया डे के मौके पर कही। ऋषि इस समय पीजीआई में बतौर जूनियर लैब टेक्निशियन काम रहे हैं और उनका सपना इसी फील्ड में अपना नाम रोशन करना है।
ऋषि का कहना है कि वर्ष 1981 में जब वह 6 महीने का था तो उसे थैलेसीमिया डिटेक्ट हुआ। तब से आज तक पीजीआई के थैलेसीमिया वार्ड में हर 20-25 दिनों में ब्लड ट्रांसफ्यूजन हो रहा है। यह सही है कि कई बार ट्रांसफ्यूजन के समय इंफेक्शन हो जाता है, इससे ब्लड प्रेशर लो हो जाता है और अधिक कमजोरी महसूस होती है। लेकिन ऋषि हर बार इन्ह बातों को जिंदगी का हिस्सा मानकर चुपचाप सह जाते हैं।
परिवार का सहयोग मिला :
‘मुझे इस बात की खुशी है कि मेरी फैमिली से मुझे पूरा सपोर्ट और प्रोत्साहन मिलता है। यही कारण है कि इतनी तकलीफ होने के बाद भी मैंने स्टडी में कोई कमी नहीं छोड़ी।
मेडिकल लैब टेक्निशियन में बीएससी की डिग्री के बाद मैंने माइक्रोबायोलॉजी में एमएससी की और 65 फीसदी अंक हासिल किए। इस समय मैं जॉब के साथ-साथ यूजीसी नेट की तैयारी कर रहा हूं।’ कुछ ऐसी ही कहानी है, अलका की। पीजीआई के थैलेसीमिया वार्ड में बतौर कम्प्यूटर अकाउंटिंग का काम कर रहीं अलका का सपना हायर स्टडी के लिए विदेश जाना और किसी हायर पोस्ट पर जाकर उन थैलेसीमिक बच्चों की आर्थिक मदद करना है जिन्हें पैसों की कमी के कारण इलाज बीच में ही छोड़ना पड़ता है। अलका का कहना है कि इस बीमारी को एक चैलेंज के रूप में लिया जाए और जीवन के हर पल को जिया जाए तो बीमारी के साथ-साथ अपने सपने को भी साकार किया जा सकता है। हां, इस चैलेंज को स्वीकारने के लिए फैमिली सपोर्ट बहुत जरूरी है।
325 लोग रजिस्टर्ड:
इस समय पीजीआई में करीब 325 थैलेसीमिक लोग रजिस्टर्ड हैं, जो कि 6 महीने से लेकर 25 साल तक की उम्र के हैं।
क्या है थैलेसीमिया:
थैलेसीमिया एक जैनेटिक डिसऑर्डर है। इसमें बॉडी में जितना ब्लड बनना चाहिए उतना नहीं बन पाता और जो बनता है वह भी जल्दी नष्ट हो जाता है।
क्या हैं लक्षण :
पीजीआई के पीडियाट्रिक्स डिपार्टमेंट की डॉ. अमिता त्रेहन ने बताया कि इस बीमारी के लक्षण बच्चे के जन्म के कुछ महीने के बाद ही नजर आने लगते हैं। बच्चे का शरीर पीला पड़ने लगता है और लीवर बढ़ जाता है।
की जा सकती है रोकथाम:
डॉ.त्रेहन का कहना है कि इस बीमारी को पूरी तरह रोका तो नहीं जा सकता, लेकिन स्क्रीमिंग टेस्ट करवाकर इसकी रोकथाम की जा सकती है। आजकल डॉक्टर मैरिज से पहले सभी को स्क्रीमिंग टेस्ट कराने की सलाह देते हैं, क्योंकि मदर-फादर दोनों पीड़ित हैं तो बच्चे में थैलेसीमिक होने की 25 फीसदी संभावना रहती है।
20-25 दिन में करवाना पड़ता है ब्लड ट्रांसफ्यूजन :
हर 20-25 दिन में थैलेसीमिक पेशेंट को ब्लड ट्रांसफ्यूजन करवाना पड़ता है। इस पर हर महीने 3 से 4 हजार रुपए की जरूरत पड़ती है।