Vaama
Relationships Relationships
वीर सपूत को जन्म देने और उसकी शहादत को भी सगर्व धारण करने के लिए निश्चय ही मां में भी अद्भुत साहस व जीवट होना चाहिए। भगतसिंह की मां विद्यावती के लिए देशप्रेम का जÊबा नया नहीं था। यह तो उनके परिवार की उज्जवल परम्परा थी। उन्होंने ससुर सरदार अजरुनसिंह, पति किशनसिंह और देवरों को अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष करते ही देखा था। संघर्ष की राह स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज की प्रेरणा से मिली थी, जिसका गतिहीन होना असम्भव था। उनके बच्चों को भी संस्कारों में देशप्रेम का सबक मिला था। सबसे बड़ा बेटा भगतसिंह क्रांति और बलिदान का पर्याय बनकर भारतवासियों का ह्रदय सम्राट बन चुका था। भगतसिंह के बलिदान के समय और उसके बाद मां विद्यावती ने किस अदम्य साहस और धैर्य से अपना जीवन बिताया होगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है।
भगतसिंह पर इतिहासकारों ने बहुत कुछ लिखा। उज्जैन नगरी के यशस्वी लेखक श्रीकृष्ण सरल ने देश के सभी महान क्रांतिकारियों पर महाकाव्य तैयार किए। भगतसिंह पर भी उन्होंने महाकाव्य की रचना की। लेखन के पूर्व वे शहीद की माता से आशीर्वाद लेने उनके गांव पहुंचे और अपना मंतव्य बताया। मां ने वादा किया कि जब ग्रंथ पूरा हो जाएगा तो वे स्वयं उज्जैन आएंगी। और सचमुच महाकाव्य पूर्ण होने का आमंत्रण पाकर वे 9 मार्च 1965 को उज्जैन पहुंचीं और यह दिन ऐतिहासिक व अविस्मरणीय हो गया।
शहीद माता का जो स्वागत और सत्कार उस दिन हुआ, उसने सिद्ध कर दिया कि संसार की दृष्टि में मां का क्या महत्व है। बच्चों के कर्मो में मां के आशीष और पुण्य ही परिलक्षित होते हैं। यह एक मां के संस्कार, त्याग और संघर्ष को आदरांजलि थी। भगतसिंह के विशाल चित्र से सज्जित एक भव्य बग्घी में बैठाकर मां की शोभायात्रा निकाली गई। इस समय जितनी संख्या में लोग मौज़ूद थे, उसने सारे कीर्तिमान तोड़ दिए। आस-पास से बड़ी संख्या में लोग मां के दर्शन के लिए आए थे। उनकी सुरक्षा के लिए भारी पुलिस तैनात थी। लोग मां के चरणों में मस्तक रखने को व्याकुल थे। पुलिस लोगों को पीछे हटाती मगर भीड़ तो जैसे तृप्त ही नहीं हो रही थी। मां के दर्शन, चरणस्पर्श के लिए जनसैलाब पुलिस की लाठी तक खाने को तैयार था। जगह-जगह पर बने स्वागत द्वारों से मां के ऊपर फूलों की भारी वर्षा हो रही थी। हज़ारों नयन उस वीर-प्रसूता को निहारकर धन्य हो रहे थे। बग्घी को रोककर माता की आरती उतारी जा रही थी। अद्वितीय और आलौकिक नÊारा था। लोग अपने बच्चों को मां के चरणों में डाल रहे थे कि उनका स्पर्श और आशीष पाकर उनके लाडले में भी भगतसिंह जैसा साहस और देशप्रेम आ सके। माता भी दुलार से सभी बच्चों के सिर पर हाथ फेर रही थीं, सभी के अभिवादन का प्रतिउत्तर स्नेहपूवर्क दे रहीं थीं। बड़े-बुज़ुर्गो व साधु-सन्यासियों को वे स्वयं प्रणाम कर रही थीं। इस पूरे उपक्रम में उनकी दोनों बांहें बुरी तरह सूज गई थीं। बरसाए गए फूलों से बग्घी सात बार पूरी भर गई और खाली की गई। इसके बाद मां मंच पर चढ़ीं, जहां भगतसिंह सहित चंद्रशेखर आज़ाद और राजगुरू की तस्वीरें भी सुशोभित थीं। मां ने अपना उद्बोधन शुरू किया, ‘कौन कहता है, भगतसिंह, आज़ाद, राजगुरू या सुखदेव इस संसार में नहीं हैं? देखो, ये सब मेरे सामने बैठे हैं।
ये सब मेरे बच्चे ही तो हैं।’ इसके बाद एक पंजाबी नौजवान ने भगतसिंह को दी फांसी के प्रसंग को पंजाबी घोड़ी-गीत के रूप में मार्मिक स्वर में गाया। वातावरण गमगीन हो गया। उपस्थित जनसमुदाय में से सिर्फ मां की आंखें सूखी रहीं, बाकी सबकी आंखों से अविरल अश्रुधारा बह रही थी। मां ने सरलजी से पूछा, ‘बेटा, क्या तुम आज़ाद पर महाकाव्य लिख चुके हो?’ ‘ना’ का जवाब पाकर मां ने कहा, ‘पहले तो उसी पर लिखना था, पहले शहीद तो वही हुआ है।’ सरलजी ने तुरन्त मां के चरणों को छूकर संकल्प लिया कि अगला ग्रंथ आज़ाद पर ही होगा। विमोचन की प्रति नीलाम की गई। आखिरी बोली तीन हज़ार तीन सौ इक्कीस रुपए पर रूकी। विद्यावतीजी ने इस राशि के साथ वह सारी राशि जो उन्हें भेंट स्वरूप मिली थी, अपने पुत्र समान बटुकेश्वर दत्त के पास भेज दी, जो आजीवन कारावास से मुक्त होने के बाद काफी अस्वस्थ चल रहे थे।