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सिविल जज परीक्षा, इंटरव्यू के नंबर हुए कम

बिलासपुर. जिला अधिवक्ता संघ की याचिका पर हाईकोर्ट की फुल बेंच ने नियमों में संशोधन कर राज्य शासन को भेजी अनुशंसा। रजिस्ट्रर जनरल के जवाब के एक दिन पहले ही जारी कर दी गई अधिसूचना।

सिविल जज वर्ग- दो के इंटरव्यू में अब 50 की जगह पर 15 नंबर ही दिए जाएंगे। हाईकोर्ट ने जिला अधिवक्ता संघ की याचिका दायर होने के बाद व्यवस्था में संशोधन कर किया है। इस संबंध में सात मई को राज्यपाल की ओर से अधिसूचना भी जारी कर दी गई है।

राज्य की जिला अदालतों में सिविल जजों की भर्ती के लिए परीक्षा इस बार लोक सेवा आयोग की जगह हाईकोर्ट द्वारा आयोजित की जा रही है। भर्ती के लिए परीक्षा रजिस्ट्रार जनरल कार्यालय के माध्यम से संचालित की जा रही है।

यहां से प्रकाशित कराए गए विज्ञापन के अनुसार परीक्षा में लिखित परीक्षा में 100 अंक और इंटरव्यू में 50 नंबर रखे गए थे। जिला अधिवक्ता संघ ने सचिव देवेश दीक्षित के माध्यम से इंटरव्यू के लिए इतने ज्यादा नंबर रखने को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी।

पांच मई को प्रकरण की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने रजिस्ट्रार जनरल को जवाब देने के लिए आठ मई का समय दिया था। इसके पहले ही हाईकोर्ट ने राज्य शासन को इंटरव्यू में 50 की जगह 15 नंबर देने की अनुशंसा कर दी। हाईकोर्ट से अनुशंसा मिलने के बाद राज्य शासन ने राज्यपाल के माध्यम से इस बाबत बुधवार को अधिसूचना भी जारी कर दी।

मामले की गुरुवार को सुनवाई के दौरान राज्य शासन और हाईकोर्ट की ओर से रजिस्ट्रार जनरल ने जस्टिस एलसी भादू व जस्टिस सुनील सिन्हा की डिविजन बेंच को इंटरव्यू के नंबर कम करने की जानकारी दी। याचिका में की गई मांग पर कार्रवाई होने पर कोर्ट ने याचिका को निराकृत घोषित कर दिया। गौरतलब है कि याचिकाकर्ता ने इंटरव्यू में 50 नंबर देने को अवैधानिक ठहराया था।

उन्होंने अशोक यादव विरुद्ध हरियाणा सरकार के मामले में वर्ष 1985 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए आदेश का हवाला दिया, जिसके अनुसार किसी भी परीक्षा के इंटरव्यू में कुल नंबर के 12.5 प्रतिशत से ज्यादा नंबर नहीं दिए जा सकते, जबकि सिविल जज के इंटरव्यू में 50 नंबरों के अनुसार 33 प्रतिशत से ज्यादा नंबर देने की व्यवस्था कर दी गई थी। याचिकाकर्ता की ओर से वकील रजनीश बघेल, राकेश शुक्ला, सुरेश पांडे ने पैरवी की।

आयु सीमा पर दिया नियमों का हवाला
याचिकाकर्ता ने परीक्षा में 35 साल उम्र रखने को भी चुनौती दी थी। उसने मध्यप्रदेश में आयुसीमा 38 वर्ष होने की जानकारी देते हुए यहां भी संशोधन करने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि नियमों के अनुसार यह छूट दे पाना संभव नहीं है।

विकलांगों के आरक्षण में भी विसंगति
इस मामले में सुशील हजारी ने भी इंटरविनर के तौर पर हस्तक्षेप याचिका दायर की है, जिसमें परीक्षा में विकलांगों को दिए जा रहे आरक्षण में विसंगति का मुद्दा उठाया है। उसने नियमों का हवाला देते हुए बताया कि इस तरह की प्रतियोगी परीक्षा में विकलांगों को तीन प्रतिशत आरक्षण निर्धारित है।

इसके अनुसार सिविल जज वर्ग-दो के 60 पदों में से दो पद विकलांगों के लिए सुरक्षित रखे जाने थे, जबकि उनके लिए एक पद ही आरक्षित किया गया है। कोर्ट ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता को आदेश दिया कि वह मामले में अलग से याचिका दायर करे।





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