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रोज होता है शिकार बाबू..

बिलासपुर. hunt करीब 552 वर्ग किलोमीटर में फैले अचानकमार अभयारण्य के 22 गांवों और मुख्य मार्गो के किनारे स्थित होटलों, दुकानों में शिकार की बात पर कोई नहीं चौंकता। शिकारियों के पकड़े जाने की खबर जरूर उन्हें चौंकाती है, क्योंकि शिकार तो रोज होता है, शिकारी कभी-कभी ही पकड़े जाते हैं।

राज्य के सबसे महत्वपूर्ण रिजर्व फारेस्ट, बायोस्फियर क्षेत्र और टाइगर रिजर्व घोषित हो चुके अचानकमार अभयारण्य की सुरक्षा व्यवस्था की बदहाली चिंताजनक स्थिति पर पहुंच चुकी है। रिजर्व फारेस्ट के भीतर जाने के कई ऐसे रास्ते हैं जहां कोई बेरियर नहीं है। कोटा पार करते ही शिवतराई से जंगल के अंदर गया रास्ता अभयारण्य के पूरे एक हिस्से में बिना किसी रोक-टोक के घूमने और शिकार करने के लिए सबसे पसंदीदा रास्ता है।

इसके लिए अचानकमार बेरियर भी पार नहीं करना पड़ता। इसी तरह बिंदावल-छपरवा के बीच, मनियारी पुल के बाद, तिलईडबरा के पास से, खोंगसरा पहुंच मार्ग और लमनी-अतरिया के बीच करीब 15 ऐसे रास्ते हैं जो जंगल के अंदर जाते हैं और उन पर कोई बेरियर नहीं लगे हैं। ये रास्ते शिकारियों के लिए जन्नत का रास्ता है।

चारपहिए वाहन आसानी से अंदर चले जाते हैं और शिकारी सर्च लाइट के जरिए जंगल के चीतल, हिरण, खरगोश, जंगली सूअर तक मार डालते हैं। वन विभाग की पेट्रोलिंग रात को सिर्फ कागजों पर होती है, लिहाजा शिकारी, शिकार लेकर आसानी से निकल जाते हैं।

जानकार बताते हैं कि चीतल की बड़ी संख्या और सुरक्षा व्यवस्था नहीं होने के कारण अचानकमार अभयारण्य में अब मध्यप्रदेश के डिंडौरी, मंडला, अनूपपुर और पंडरिया, कवर्धा तक के शिकारी, शिकार करने आ रहे हैं।

नियमत: शाम 6 बजे के बाद अभयारण्य में प्रवेश करना मना है, लेकिन रोज देर रात तक अंदर जीप, कार व मोटरसाइकिल सवारों का आना-जाना लगा रहता है। ये लोग बड़ी तादात में वन्य प्राणियों का शिकार कर रहे हैं। इनमें शौकिया शिकार करने वाले कुछ राजनेता, प्रभावशाली लोग भी शामिले हैं जिन पर वन कर्मी कोई कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं करते।

शिकार करने वालों में जंगल से अवैध रूप से लकड़ी काट रहे लोग और वन्य प्राणियों के नाखून, खाल व अन्य अंगों की बिक्री करने वाले लोग भी शामिल हैं। इन पर कार्रवाई की बात करें तो साल में मात्र औसतन दो या तीन शिकार के प्रकरण बनते हैं।

इन लोगों के साथ-साथ अभयारण्य के बीच बसे रंजकी, चिरहट्टा, बोइरहा, तातपानी, सुरही, कटामी, तिलईडबरा, बोकराकछार, सांभरधसान, जल्दा, विरारपानी सहित 22 गांव के आदिवासी भी बड़ी तादात में चीतल, खरगोश, साही, मोर, कोटरी और जंगली भैंसे तक का शिकार कर रहे हैं।

इन गांवों में निवास करने वाले बैगा व अन्य जनजातियों के लिए शिकार परंपरा और जरूरत दोनों है। बीच जंगल में बसे इन गांवों तक वनरक्षक दो-चार दिन में ही एकाध चक्कर लगा पाते हैं, इसलिए ग्रामीणों द्वारा शिकार की बात सामने नहीं आ पाती। परंपरा के चलते पूरा गांव मिलकर शिकार करता है और मिलकर मांस खाया जाता है, लिहाजा ग्रामीण खामोश रहते हैं।

एक वन कर्मी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, कि हमें पता भी चलता तो कार्रवाई नहीं करते, क्योंकि पूरा गांव खिलाफ उठ खड़ा होता है। चीतल का मांस यहां के आदिवासियों का मुख्य भोजन ही है, लिहाजा किसी न किसी गांव में रोज चीतल मारा जाता है और उसका मांस पूरे गांव के घरों में बंटता है। चीतल की प्रवृत्ति के अनुसार उनका झुंड रात होते ही गांव के पास व खेतों में आ जाता है, लिहाजा ग्रामीणों को शिकार करने में आसानी होती है।

चीतल उनकी फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं, लिहाजा आदिवासी उन्हें मारने मे नहीं हिचकते। चीतलों की संख्या साल दर साल बढ़ रही है, इसलिए वन विभाग भी इसके शिकार के प्रति ज्यादा गंभीर नहीं है। पिछले साल वन विभाग की अधिकृत गणना के अनुसार अभयारण्य में चीतलों की संख्या करीब 2000 थी, जबकि अधिकारियों का मानना है कि इस साल इसमें और वृद्धि हो गई होगी।

>> अभयारण्य में शिकार रोकने के लिए व्यापक स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। बेरियर, रेस्ट हाउस, ढाबों में शिकारियों के फोटो लगाए जाएंगे। पेट्रोलिंग बढ़ाई जा रही है। बेरियर पर वाहनों की जांच की जाएगी। आदिवासियों द्वारा शिकार करने की प्रवृत्ति कम हुई है। अब किसी त्यौहार में ही उनके द्वारा चीतल मारने की बात सामने आती है।
एस डी बड़गैया, डीएफओ, बिलासपुर

बेरियर सिर्फ नंबर दर्ज करने के लिए
अभयारण्य में प्रवेश और बाहर निकलने के बीच पटैता, अचानकमार व लमनी तीन बेरियर हैं। इन तीनों बेरियर पर वाहनों की जांच का नियम है। इस जांच में वनकर्मियों को यह देखना है कि वाहन में किसी प्रकार का शिकार, हथियार, सर्च लाइट, वनोपज, लकड़ी या कोई अवैध सामान तो नहीं है।

बेरियर में यदि गंभीरता से जांच की जाए, तो शिकार व वनोपज की तस्करी बंद हो जाएगी, लेकिन तीनों बेरियर पर सिर्फ वाहन का नंबर रजिस्टर में दर्ज कर वाहन आगे निकाल दिया जाता है। मंगलवार को एक बड़ी मादा चीतल के शव के साथ शिकारियों के पकड़े जाने के बावजूद तीनों बेरियर में से किसी में भी वाहनों की जांच नहीं हो रही थी।

वाहनों की आवाजाही बंद करें
अभयारण्य में वन्य प्राणियों के संरक्षण के लिए डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के साथ मिलकर काम कर रहे नेचर क्लब के अनुराग शुक्ला स्वीकार करते हैं कि अचानकमार में बाहरी शिकारी और आदिवासी मिलकर बड़े पैमाने पर शिकार कर रहे हैं। वे अभयारण्य के बीच से दिन में निजी वाहनों की आवाजाही बंद करने की मांग करते हैं। उनके अनुसार वाहनों की आवाजाही बंद होने से शिकार पर रोक लग सकती है।

वे कहते हैं कि वन विभाग को हाल ही में एक मिनी ट्रक, एक जीप, दो जिप्सी, 6 मोटरसाइकिल और 8 वायरलेस सेट दिए गए हैं। इससे उनकी पेट्रोलिंग क्षमता बढ़नी थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वन विभाग को जंगल के अंदर पेट्रोलिंग बढ़ाना होगा और अभयारण्य के गांवों को बाहर बसाना होगा, तभी शिकार पर रोक लग सकती है।





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