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डायरी

मदर्स-डे पर पेश है एक विशेष कहानी.इस संसार में होने वाले मां के समस्त क्रिया-कलाप आज सम्पन्न हो चुके थे। मां से स्नेह रखने वाले सारे रिश्तेदार भी एक-एक करके जा चुके थे। हॉल में रखी तस्वीर में मां मुस्करा रही थीं, बिल्कुल वैसे ही, जैसे बचपन से लेकर अन्त समय तक मां मुझे देखकर मुस्कुराती थीं।

आज मुझे क्या हो रहा था? मां के रहने पर कभी मुझे उनकी उपस्थिति का इतनी शिद्दत से अहसास क्यों नहीं हुआ था, जितना कि आज उनकी अनुपस्थिति से उपजे खालीपन से हो रहा है। आज क्यों मां के आंचल की उस मनमोहक सुगंध का अहसास हो रहा है, जिसकी गंध पाते ही शैशवास्था में मैं मचल पड़ता था। जिस आंचल के साए और तर्जनी मात्र के स्पर्श से अंधेरे, भीड़ के भय और ज्वर की तपन में एक सुकून का अहसास हो जाता था, आज लग रहा है कि वह स्पर्श, वह सुगंध अरसे बाद मेरे वजूद में समा रही है।

आज मेरा शरीर शिथिल हुआ जा रहा था। आज मन को कुछ खटक रहा था। मुझे याद नहीं कि कभी मैंने मां की किसी ज़रूरत को पूरा न किया हो, कभी मां को पैसों की कमी होने दी हो, कभी मां से ऊंची आवाज़ में बात की हो। फिर भी लग रहा था कि मां को मुझसे कुछ और चाहिए था।

कदम स्वत: ही पिछले तेरह दिनों से बंद पड़े मां के कमरे की तरफ बढ़ गए। बंद दरवाज़ों के खुलते ही जैसे मां जीवन्त हो उठीं। पूजा की चौकी पर विराजमान भगवान और उनके सामने प्रसाद और जल के लिए रखे बर्तन शायद भरे जाने के इंतज़ार में थे। पीतल की वह छोटी-सी घंटी, जिसकी टिन-टिन से पिछले पचास वर्षो से हमारी सुबह आंख खुलती आई थी, शांत हो चुकी थी। मां के कमरे से सटी बालकनी में तुलसी के साथ इतने सारे फूलों के पौधे हैं, मैं आज देख रहा था।

टेबल पर रखी डायरी के बीच में खुला पेन पड़ा हुआ था। शायद अन्त समय से पहले मां कुछ लिख रही थीं। मेरे भारी कदम स्वत: ही डायरी तक पहुंच गए। बंद डायरी पर मेरे हाथ कुछ इस तरह फिरे जैसे बचपन में मां, मेरे सिर पर हाथ फेरती थीं। ‘बेटा विमल, शाम को मेरे लिए एक डायरी ले आना।’अचानक ही कुछ महीनों पहले कही मां की यह बात कानों में गूंज उठी।

‘इस उम्र में डायरी का क्या करोगी मां?’

‘कुछ विचार मन में उत्पन्न होते हैं, बेटा! सोचती हूं, उन्हें लिख डाला करूं।’

शाम को डायरी लाकर मैंने अपने बेटे सर्वाग के हाथों मां को भिजवा दी थी। मां उस डायरी पर अपनेकौन-से विचार लिख रही हैं, यह जानने की फिर मैंने कभी कोशिश नहीं की। शायद मां की ज़रूरतें पूरी करने मात्र तक मेरी ज़िम्मेदारी थी।

मां की डायरी का पन्ना मैंने कुछ इस तरह पलटा, जैसे बचपन में मां होमवर्क कराते समय हमारी किताबों के पन्ने पलटती थीं। ‘प्रिय पौत्र सर्वाग को समर्पित।’

मां की डायरी पर लिखे इस पहले वाक्य ने स्वत: ही दूसरा पन्ना पलटवा दिया।

‘बेटा सर्वाग, तू बहुत प्यारा है। हम सब तुझे बहुत प्यार करते हैं। मेरे मम्मी-पापा शायद तुझे मुझसे भी अधिक प्यार करते होंगे। बेटा, तू जीवन में कभी कुछ ऐसा न करना जिससे उनका दिल दुखे।’

पन्ने पलटने के लिए अब मुझे न शक्ति की ज़रूरत थी, न सोचने की।

‘बेटा, तू सोच रहा होगा कि दादी मां ने ये तो बताया ही नहीं कि मैं ऐसा क्या न करूं कि उनका दिल न दुखे। सर्वाग, बचपन तो सबका एक-सा होता है और बचपन की गलतियां भी एक-सी होती हैं पर बड़े होने पर इंसान का स्वभाव भी बदलता है और गलतियों के प्रकार भी।

तू अपने पापा के जैसा ही बनना। बस वह गलतियां न करना, जो तेरे पापा ने की हैं। नहीं, नहीं, बेटा, तेरे पापा बहुत अच्छे इंसान हैं। शायद मैंने ही कुछ गलत लिख दिया है। मुझे ये लिखना चाहिए था कि तू वो सब ज़रूर करना जो तेरे पापा करने से चूक गए। क्योंकि ‘न करके’ भी गलतियां हो जाती हैं।’

‘बेटा, एक उम्र के बाद इंसान के जीवन में बहुत खालीपन आ जाता है। माता-पिता जिन बच्चों की ज़िम्मेदारी पूरी करने के लिए अपना जीवन समर्पित कर देते हैं और स्वत: जब बुढ़ापे में वे खुद उनकी ज़िम्मेदारी बन जाते हैं, तब एक भय, एक संकोच की भावना जन्म लेती है उनके अंदर कि कहीं हम इन पर भारी तो नहीं पड़ रहे हैं। आवश्यकताएं सीमित हो जाती हैं। ज़रूरत रह जाती हैं, तो बस अपनेपन और कुछ पल के साथ। उसी तरह, जैसे दिन भर उछलकूद करने वाला बच्च, सोने के समय मां का साथ तलाशता है, वैसा ही सुकून मिलता है बुढ़ापे में मां- बाप को बच्चों का सानिध्य पाकर।

ऐसे ही सानिध्य के लिए तेरी ये दादी का मन तरसता है। सिर्फ कुछ पल का सानिध्य चाहता है मन कि मेरा बेटा मेरे पास हो। क्या करूं, मां हूं उसकी। गोदी में खिलाया है, ऊंगली पकड़ कर स्कूल बस में बिठाया है, रात-रात भर जाग कर परीक्षा में साथ निभाया है। खुश होकर वह गले में बांहें डालकर झूल गया है, तो दुख में गोदी में उसका सिर रख सहलाया है।

आदत पड़ी है, उसके साथ की पर उसे तो बढ़ती उम्र के साथ-साथ पत्नी, बच्चे, संगी-साथी जैसे बहुत से साथी मिलते गए और मां छूटती गई, पर मेरी चाहत तो वैसी ही बरकरार है बेटा।

आज भी उसके ऑफिस से आने के टाइम पर वैसे ही व्याकुल हो उठती हूं, जैसे बचपन में स्कूल से आने के वक्त पर होती थी। बचपन में सीढ़ियों पर चढ़ते कदम के साथ मम्मी..मम्मी की गुहार सुनने वाले ये कान, आज सिर्फ एक बार, ‘मां, कहां हो तुम? सुनने को तरसते हैं। आज तो मां बेटे के बीच संवाद का सेतु तुम और तुम्हारी मां बन गए हो।

कभी-कभी दिल करता है कि उसे डांटू, जैसे बचपन में डांटती थी, पूरे अधिकार से। पर पता नहीं क्यों हिम्मत नहीं होती। पर एक दिन पूछूंगी ज़रूर कि तू मां की तबियत अब कैसी है?’यह अपनी मां से ही पूछने के बजाए अपनी पत्नी से क्यों पूछता है? और कहूंगी कि बेटा, तेरे हाथ का एक हल्का-सा स्पर्श अपने माथे पर पाकर ही तेरी मां बिल्कुल ठीक हो जाएगी।

कई बार इच्छा होती है कि तेरे पापा मेरे कमरे में आकर बैठें। कुछ पुरानी बातें करें। हम साथ बैठकर पुराना एल्बम देखें। कभी मुझसे कहें कि उसे भी उसके पापा की याद आती है। जब मुझे तेरे बाबा की याद सताती है तो अपने आांसूओं को रोक नहीं पाती हूं और उस समय यही मन करता है काश मेरा बेटा मेरा कंधा पकड़कर कहता- ‘मत रो मां।’ पर वह बहुत व्यस्त रहता है, वह भी क्या करे?

मुझे याद है उस दिन उसके ऑफिस में पैरेंट््स-डे सेलिब्रेशन था, तो वह कैसे मुझे दो दिन पहले से हिदायतें दे रहा था- ‘मां चुन कर सबसे अच्छी वाली साड़ी पहनना। मेरी मां सबसे अलग दिखनी चाहिए।’ घर से निकलते वक्त जब उसने खुद झुक कर मेरी साड़ी की प्लेट ठीक की, तो मैं उसे निहारती रह गई थी।

महीनों तक बेटे का वह व्यवहार मुझे गुदगुदाता रहा था, सोच-सोच कर मुस्कुराती रहती थी मैं। कितना अपनापन भरा व्यवहार था उसका, उन सारी बातों से अलग जिसमें वह मेरी दवाइयां भी तेरे हाथ से भिजवाता है और बहू से पुछवाता है कि मां का मामा के यहां शादी मे जाने का रिजर्वेशन कबका करवाऊं ?

बेटा सर्वाग, तू सोच रहा होगा कि दादी मां भी किन बातों को दिल से लगाती हैं। तू अभी नहीं समझेगा। बुढ़ापा तो पैर की बिवाई है बेटा। अपने पैर में कटती है, दर्द तभी समझ आता है।

ईश्वर तुम सबको सदा खुश रखे। जो अपने माता-पिता की सेवा करता है, उसे संतान से सुख अवश्य मिलता है। तेरे माता-पिता ने हमारी जी-जान से सेवा की है, तू उन्हें हमेशा खुश रखना और तू उन बातों का भी ज़रूर ख्याल रखना, जो मैंने बताई हैं। बेटा, बुढ़ापे का सबसे बड़ा दुश्मन अकेलापन होता है। ईश्वर न करे, पर अगर तेरे पापा-मम्मी में से बुढ़ापे में कोई एक अकेला रह जाए, तब तू उनका ज़्यादा ख्याल रखना।

दिन भर में दो-चार बार उन्हें इस बात का एहसास ज़रूर कराते रहना कि घर में उनकी उपस्थिति मायने रखती है। उन्हें ‘मां’ या ‘पापा’ कहकर दिन भर मे चार- छह आवाज़ें ज़रूर लगा लेना। कानों को अच्छा लगता है बेटा। अपने बच्चे बाल रूप में दिखते हैं, उन संबोधनों के माध्यम से। कभी-कभी मां के गोदी में सिर रखकर लेट जाया करना जिससे वह अपना वात्सल्य लुटा सके।

बेटा, बचपन और बुढ़ापा एक-सा होता है। बचपन में बच्च मां बाप से डरता है और बुढ़ापे में मां-बाप बच्चों से। बचपन में बच्चे को मां-बाप की ज़रूरत होती है और बुढ़ापे में मां-बाप को बच्चों की। पर एक बहुत बड़ा फर्क होता है, बेटा। बच्चा जो चाहता है, हठ करके ले लेता है पर बुढ़ापा अपनी चाहत होठों तक लाने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।

मेरे बेटे का हमेशा ख्याल रखना सर्वाग अब तू बड़ा..’

और बस इसके आगे मां को वक्त ने और कुछ लिखने का अवसर नहीं दिया था। डायरी पर लिखे मां के शब्द मेरे आंसूओं से धुल गए थे। मेरी कसक सही थी। मैं मां को वह सब नहीं दे पाया था, जो एक बेटे को मां को देना चाहिए था। मां को भावनात्मक साथ भी चाहिए था मेरा, जो मैं समझ न पाया। अपनी विस्तृत दुनिया के विस्तार में मां को समय देने की याद तक नहीं आई थी कभी मुझे।

अब मन चीत्कार कर रहा था। कलेजा फट रहा था पर कुछ विकल्प नहीं था। अपने को सम्भालना मेरे वश में नहीं था और मैं मां की डायरी को कलेजे से लगा, मां-मां की आवाज़ लगा कर चीख-चीख कर रो पड़ा।





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Deepak Patidar
Saturday, 10th May 2008, 17:13
Ultimate.