जोधपुर. बेलगाम शिकार एवं लगातार सिकुड़ने वन क्षेत्र के कारण जोधपुर संभाग में चिंकारों की संख्या अचानक घट गई। महज एक साल के भीतर करीब 76 हजार हिरणों की संख्या घटने से वन्य जीव प्रेमियों की चिंता बढ़ गई। घटते चिंकारों की चिंता विदेशों तक पहुंची और यूके की द रूफर्ड रिसर्च फाउंडेशन एवं इकोलॉजी रूरल डवलपमेंट सोसायटी ने उन पर शोध शुरू करवा दिया।
सोसायटी के वन्य जीव विशेषज्ञ पिछले 8 वर्षों से इनके निवास स्थानों, खान-पान, प्रजननकाल व संरक्षण के बारे में शोध करने में जुटे हैं। विशेषज्ञों ने चिंकारा प्रजाति की संख्या में हो रही कमी को देखते हुए 2006-07 में एक सर्वे किया, जिसमें चिंकारा के थार में विचरण एवं संरक्षण के लिए कुछ स्थान चिंहित किए थे।
इनमें बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर, नागौर और जोधपुर क्षेत्र में चिंकारा को संरक्षित रखने के लिए हर जगह कम्युनिटी रिजर्व बनाकर कार्यशाला आयोजित कर स्थानीय लोगों में जागरुकता लाने का कार्यक्रम बनाया। इसके लिए मई 2008 से 2009 तक द रूफर्ड रिसर्च फाउंडेशन ने विशेषज्ञों को यह प्रोजेक्ट सौंपा गया है।
संख्या कम होने का कारण
रूफर्ड रिसर्च फाउंडेशन यूके के सहयोग से जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय के प्राणीशास्त्र विभाग के प्रोफेसर डॉ. सुमित डूकिया एवं डॉ. गंगाराम जाखड़ की टीम ने गत दो वर्षों में राजस्थान के संपूर्ण मरुस्थल में किए गए सर्वे में इनकी संख्या वर्ष 2002 के अध्ययन से काफी कम दर्ज की गई है। फलौदी क्षेत्र में इनका घनत्व 15-18 प्रति वर्ग किमी है, वहीं 2002 में इनका घनत्व 21-24 प्रतिवर्ग किमी था।
इसी प्रकार गुढा विश्नोइयां क्षेत्र में इनका घनत्व 16-20 प्रतिवर्ग किमी से घटकर 10-12 प्रतिवर्ग किमी ही रह गया है। चिंकारा को विश्नोई व जाट के बाहुल्य क्षेत्रों में इनको स्वच्छंद विचरण करते देखा जा सकता है। इस सर्वे के दौरान देखा गया कि खेतों में लगे शिरनियों के पेड़, बेर की झाड़ियां, कैर को खेती करने के दौरान काट दिया जाता है, जबकि ये इनका प्रमुख भोजन होने के साथ इनका निवास स्थान भी होते हैं।
कम्यूनिटी रिजर्व से संरक्षित
वर्ष 2005 में केंद्र सरकार ने भारतीय वन्यजीव प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 में संशोधन कर दो और श्रेणियां घोषित की। इनमें स्थानीय समुदायों की ओर से संरक्षित क्षेत्रों को मान्यता प्रदान करते हुए उन क्षेत्रों को कम्युनिटी रिजर्व नामक क्षेत्र एवं प्रजाति विशेष के संरक्षण के लिए कन्र्जवेशन रिजर्व क्षेत्र बनाने के प्रयास करने को कहा।
इस सर्वे में जोधपुर जिले में ऐसे 5 क्षेत्र चिह्न्ति किए गए हैं, जहां कम्युनिटी रिजर्व बनाकर चिंकारा एवं अन्य संकटग्रस्त प्रजातियों को स्थानीय समुदायों एवं सरकार के सहयोग से संरक्षित किया जाएगा।
चिह्न्ति स्थान-संकटग्रस्त जातियां
गुढ़ा विश्नोइयान, खेजड़ली: चिंकारा, कृष्णमृग, भेड़िया, सियार, जंगली बिल्ली, लोमड़ी।
रतकूड़िया, खांगटा, कोसाणा: चिंकारा, मरुलोमड़ी, मरु बिल्ली, भेड़िया, कृष्णमृग, सियार।
बालेसर-देचू: चिंकारा, मरुलोमड़ी, मरुबिल्ली, जंगली बिल्ली।
>> यूके की रूफर्ड रिसर्च फाउंडेशन की ओर से मई 2007 से मई 2008 तक के लिए 2 लाख का बजट दिया गया है। इस दौरान हम थार में चिंकारा को संरक्षण देने के लिए एक सामुदायिक प्रयास करते हुए कम्युनिटी रिजर्व जैसे कार्यक्रम आयोजित कर लोगों को इसके बारे में जानकारी देंगे।
डॉ. सुमित डूकिया, सचिव, इकोलॉजी रूरल डवलपमेंट सोसायटी
भयावह स्थिति
मरूप्रदेश में बहुतायत में चिंकारा होते हैं। विश्नोई व जाट बाहुल्य वाले इलाकों में इनका स्वछंद विचरण देखा जा सकता है। वर्ष 03 में जोधपुर में चिंकारों की संख्या 1 लाख, 2 हजार 725 थी जो अगले ही साल करीब 40 हजार बढ़ कर 1 लाख, 42 हजार 501 हो गई, मगर अगले ही साल ने वन्य जीव प्रेमियों की चिंता बढ़ा दी। वर्ष 05 में चिंकारों की संख्या महज 66 हजार 584 ही रह गई। इसके पश्चात ही विशेषज्ञों ने 06 में चिंकारों का सर्वे किया था।
बाघ-चिंकारा समकक्ष
चिंकारा की संख्या में आ रही कमी को देखते हुए भारत सरकार ने इनका कानूनन संरक्षण करने के लिए भारतीय वन्यजीव प्राणी संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत इसे बाघ के समकक्ष दर्जा दिया और बाघ के मुताबिक इसके संरक्षण के निर्देश दिए हैं।