जोधपुर.
संभाग के 92 परिवार अपने घर के चिराग को बचाने के लिए उम्मेद अस्पताल के जोनल ब्लड बैंक की चौखट पर दस्तक दे रहे हैं। इन परिवारों के मासूम बच्चों का तो जैसे खून से रिश्ता ही जुड़ गया हो। दस -बारह दिन में ही इन बच्चों का खून पानी बन जाता है।
तब जैसे तैसे ये लोग अपने बच्चे को एक बोतल ब्लड चढ़वा कर उसे कुछ दिनों की जिंदगी का एक्सटेंशन दिलवाते हैं। यही क्रम इनकी नीयती बन गया है। ये 92 मासूम थैलेसीमिया जैसे जन्मजात रोग की चपेट में हैं।
गुरुवार को विश्व थैलेसीमिया दिवस पर इस संवाददाता ने जब मरीजों और उनके परिवारजनों से बात की तो उनकी दर्दभरी दास्तां जुबां पर आ ही गई। कोई अपनी जमीन व जेवर बेचकर तो कोई मजदूरी करके अपने लाडलों का जीवन बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
>> प्रीत जैन, उम्र 4 वर्ष, पिता का नाम पवन जैन। वे बताते हैं कि प्रीत जब दो माह का था तब इस बीमारी का पता चला। पवन जैन बिजनेस मैन हैंै। अपनी आमदनी का अधिकांश हिस्सा प्रीत को बचाने के लिए खर्च कर रहे हैं। उसकी भावी जिंदगी के बारे में सोचा नहीं,स्कूल कैसे भेजा जाए,पहले उसका हीमोग्लोबिन तो स्थिर हो।
>> ये है निखिल, उम्र 6 वर्ष, पिता दुबई में कार्यरत,मां भगवती चौपासनी हाउसिंग बोर्ड से इस मासूम को लेकर उम्मेद अस्पताल आती है,उसका कहना है कि वो इस दुख के कारण ही दुबई नहीं जा पा रही है।पति जो पैसा भेजता है उसका अधिकांश हिस्सा इसके इलाज पर खर्च हो रहा है।
>> रोगी आध्या दवे,उम्र 3 वर्ष, पिता दीपेश दवे, सिरोही की निजी स्कूल में अध्यापक,पगार 2000 रुपए,आध्या जब 3 माह की थी तो उसे थैलेसीमिया बीमारी का पता चला, तब से अब तक उसे जिंदा रखने के लिए माह में दो बार सिरोही से उम्मेद अस्पताल के जोनल ब्लड बैंक आकर दस्तक दे रहे हैं।
दीपेश का कहना है कि उसकी पगार तो जोधपुर आने जाने में ही खर्च हो जाती है। उसने अपनी सिरोही में जमीन जायदाद ये सोचकर बेच डाली कि किसी तरह आध्या बच जाए। उनका कहना है कि बच्ची कमजोर है, स्कूल कैसे भेजें? इसकी जिंदगी कैसे निकलेगी। यह सोच कर ही मन भर आता है।