Manoranjan
Cinema
Bollywood Bollywood परदे के पीछे.
मलयाली भाषा में बनी एक सफल फिल्म का हिंदी संस्करण ‘बिल्लू बार्बर’ के नाम से शाहरुख खान प्रियदर्शन के निर्देशन में बना रहे हैं और रजनीकांत के साथ दक्षिण में भी यही कहानी बनाई जा रही है।
दोनों के बीच प्रतिस्पर्धा है कि कौन पहले अपनी फिल्म प्रदर्शित करता है। संभवत: दोनों फिल्में अगस्त में प्रदर्शित हों। रजनीकांत अभिनीत फिल्म के प्रदर्शन अधिकार दक्षिण में तहसीलवार बेचे जा रहे हैं। अगर शाहरुख का गढ़ लंदन, न्यूयार्क और कनाडा है तो रजनीकांत की फिल्में जापान, इंडोनेशिया, सिंगापुर इत्यादि देशों में धूम मचाती हैं। शाहरुख के पास मुंबई है तो रजनीकांत चेन्नई का राजा है। इस एक फिल्म को लेकर रजनीकांत और शाहरुख में तनाव है परंतु दोनों ही अपनी चिंता और डर अभिव्यक्त नहीं कर रहे हैं। रजनीकांत के चाहने वाले इस टक्कर के कारण शाहरुख खान अभिनीत फिल्मों का अघोषित बहिष्कार कर सकते हैं। रजनीकांत के फैंस का जुनून वर्णित नहीं किया जा सकता।
कोई तीन दशक पूर्व राजेश खन्ना की ‘आज का एमएलए’ और अमिताभ की ‘इंकलाब’ में भी ऐसी ही प्रतिस्पर्धा थी और अमिताभ की फिल्म ने बेहतर व्यवसाय किया था परंतु उनके अपने मानदंड के अनुरूप बात नहीं बनी। लगभग चार दशक पूर्व डाकू जीवन पर आधारित तीन फिल्में एक साथ बनीं और लगभग एक कालखंड में प्रदर्शित हुई थी राजकपूर की ‘जिस देश में गंगा बहती है’ दिलीप कुमार की ‘गंगा जमुना’ और सुनीलदत्त की ‘मुझे जीने दो’ पहली दो फिल्में सफल रहीं थी। इसी तरह शशधर मुखर्जी की ‘अनारकली’ के.आसिफ की ‘मुगल-ए-आजम’ की शूटिंग के बाद प्रारंभ हुई परंतु पहले प्रदर्शित हुई।
अनुराग कश्यप ने देवदास से प्रेरित फिल्म ‘देव डी’ बनाई है। बंगाल के एक फिल्मकार गुरुदत्त की ‘कागज के फूल’ अपने ढंग से बना रहे हैं। केदार शर्मा ने 1935 में अपनी बनाइ चित्रलेखा छठवें दशक में रंगीन बनाई। एक ही कथा कई फिल्मकारों को प्रेरित करती है और सबका अंदाजे बयां अलग-अलग होता है।
दरअसल तुलना करने का हमें शौक है, जिसकी जड़ में है फैसला सुनाने की बलवती इच्छा। हमारे भीतर एक न्यायालय सदैव धड़कता रहता है और अपने गुनाहों को भूलकर हमें न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठना अच्छा लगता है। इस भीतरी न्यायालय में कानून के बदले हमारे पूर्वाग्रह और अहंकार ही निर्णायक होते हैं।