संदर्भ- 1857 का स्वतंत्रता समर
ऐसा कहा जाता है कि जो लोग अपने इतिहास पर गर्व नहीं करते और उससे सबक नहीं सीखते, वह भटक जाते हैं और अपना आत्मसम्मान व गौरव दोनों खोते हैं। आज भारत के प्रथम संगठित स्वतंत्रता संग्राम के 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं और आज समय है कि हम जरा देखें कि उन दिनों की घटनाओं से हम ऐसा क्या सबक ले सकते हैं, जो आज हमें भटकने से रोक सकता है।
1857 का महासंग्राम अचानक नहीं हो गया, बल्कि इसकी आग कई सालों से सुलग रही थी और मई महीने के पहले भी कई शहरों और कस्बों में अंग्रेज शासन के खिलाफ विद्रोह के स्वर उठते रहे थे। मई 1857 की घटनाएं तो इन सारी असंगठित घटनाओं की परिणति मात्र थीं। क्रांति की तीव्रता जितनी नगरों में थी, उससे कहीं ज्यादा वन प्रांतों में थी। क्रांति में वनवासियों और छोटे-छोटे कस्बों के निवासियों का योगदान बहुत था। अपनी जान की परवाह किए बगैर अंग्रेज सिपाहियों के अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाना और उसके दंडस्वरूप फांसी पर चढ़ जाना तो उनके लिए आम बात थी, पर अपने जीवन और विचारों की आजादी से ज्यादा कीमती नहीं।
यह है वह एक सबसे बड़ी बात जो आज हमें याद रखनी होगी - व्यवस्था की असमानताओं और ज्यादतियों के खिलाफ पहली आवाज उस वर्ग से उठती है जिसे हम अपने अस्तित्व के हाशिए पर समझते हैं। समाज का वही वर्ग जो छोटे गांवों या दूर-दराज के जंगलों के किनारे रहता है, वही अपने असंतोष को ऐसी आवाज और पहचान देने का साहस रखता है, जिसमें आगे चलकर पूरी व्यवस्था बदलने की ताकत होती है।
इतिहास में 1857 की क्रांति की असफलता के अनेक कारण गिनाए जाते हैं, पर सबसे बड़ा कारण अपने देश के अपने लोगों की गद्दारियां हैं। हमारे देश के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की शुरुआती पहल के बाद अंग्रेजों को फिर से संगठित होकर आजादी के पहरुओं को कुचलने का मौका मिला, तो वह सिर्फ अपने लोगों के डर या लालच से। तमाम अपने लोगों ने ही स्वतंत्रता सेनानियों की योजनाओं का कच्च-चिट्ठा दुश्मन के हाथ में सौंपा और हमारी आजादी की लड़ाई पर अस्थाई विराम लगाया। आजादी के उन नायकों ने आजादी की मशाल अगली श्रेणी के देशवासियों को सौंपी और यह लड़ाई बढ़ती चली गई। आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो उन कुछ गद्दारों की हरकतों को जानकर आश्चर्य और क्षोभ होता है कि उन्होंने ऐसा क्यों किया? चूंकि आज हम इतिहास तो बदल नहीं सकते, पर उससे यह जरूर सीख सकते हैं कि गद्दारी चाहे जैसी हो -अपने काम से, अपने समाज से, अपने परिवार, अपनी संस्था से - उसे सहन नहीं करना चाहिए। किसी से गद्दारी न तो करनी चाहिए और न ही उसे सहन करना चाहिए।
1857 का संग्राम अंग्रेजों के अत्याचार, अन्याय, दमन, आर्थिक शोषण और सामाजिक व धार्मिक परंपराओं में गंभीर हस्तक्षेप के कारण भी उपजा था। 10 मई 1857 को मेरठ में सिपाही क्रांति के साथ अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध का शंखनाद हुआ और वहां से शुरू हुई यह चिंगारी जल्द ही लखनऊ, अवध, दिल्ली, कानपुर, झांसी और पूरे उत्तरप्रदेश में प्रज्जवलित होती चली गई। मध्यप्रदेश के तत्कालीन भू-भाग जैसे बुंदेलखंड, नर्मदा घाटी, मध्य भारत, मालवा, निमाड़ जैसे क्षेत्रों में भी अंग्रेज शासन के खिलाफ अपना युद्ध जारी रखा।
लखनऊ की रेजीडेंसी के पर अवध के असंगठित सेनानियों का हमला हो या फिर अन्य जगहों के राजे-रजवाड़े, किसान कामदार या आम जनता की आहुति जैसी सभी घटनाओं को एक संगठित स्वतंत्रता संग्राम के हिस्से के तौर पर जाना जाता है। इतिहास में आज हम देखते हैं कि कैसे इन सभी अलग-अलग घटनाओं में ऐसा कुछ था जो सभी में समान था। वह था एक जज्बा अपनी आजादी का हनन करने वाले विदेशी शासकों को उखाड़ फेंकने का। आज यह याद करना जरूरी है कि व्यवस्था की कमियों के खिलाफ उठी आवाज के पीछे हमेशा ही एक निहित स्वार्थ नहीं होता। वह एक आगाज भी हो सकता है असंतोष के शंखनाद का। अलग-अलग जगहों से उठी आवाज के पीछे छिपे दर्द और न्याय की मांग को समझना जरूरी है।
मेरठ में 10 मई 1857 के एक दिन पहले एक हृदयविदारक घटना घटी। इस दिन के पहले स्थानीय सिपाहियों द्वारा चर्बी लगाए कारतूस न इस्तेमाल किए जाने की सजा के तौर पर 85 सिपाहियों को खड़ा करके उनके कपड़े उतार दिए गए और उन्हें बेड़ियों में जकड़ दिया गया। यह सब बाकी सिपाहियों की आंखों के सामने किया गया जिससे उन सबके बीच एक संदेश दिया जा सके। शाम होने पर जब बाकी आतंकित सिपाही बाजार पहुंचे, तो वहां की महिलाओं ने धिक्कारते हुए उन्हें अपनी चूड़ियां दीं और कहा कि वे अगर कुछ कर नहीं सकते, तो इन्हें पहनकर बैठें। और इस सुलगते कटाक्ष को सुनकर बाकी सिपाहियों ने तय किया कि अगले ही दिन कुछ ऐसा कर देना है जिससे उनका विद्रोह सामने आए।और फिर दस मई को जो कुछ भी हुआ उसकी भनक तक अंग्रेज अधिकारियों को नहीं थी।
सवेरे से सारे काम शांति से और हमेशा की तरह हुए। वास्तविकता यह थी कि यदि कहीं पहले विद्रोह खड़ा होने की संभावना नहीं थी तो वह मेरठ में, क्योंकि वहां स्थानीय सिपाहियों की केवल दो पैदल रेजीमेंट और एक घुड़सवार रेजीमेंट थी। और गोरे सिपाहियों की पूरी सशस्त्र रेजीमेंट के साथ एक उत्तम तोपखाना था। ऐसी स्थिति में स्थानीय सिपाहियों को सफलता मिलने की संभावना बिलकुल नहीं थी। पर विद्रोहियों ने अपनी योजना जितनी कुशलता से बनाई उतनी ही तेजी से उसे पार भी लगाया और विद्रोही दिल्ली की ओर रवाना भी हो गए।
यानी याद रखने की बात है कि असंतोष की चिंगारी कहीं से भी फूट सकती है, वहां से भी जहां उसकी कोई उम्मीद न हो। और जब तक ऐसे असंतोष को समझा जाए, वह एक बड़ी आग बनकर वहां पहुंच सकता है जहां से पूरी व्यवस्था को बदलने की संभावनाएं जाग सकती हैं।
आज जब हम एक आजाद देश में हैं, तो हमारे चारों ओर एक नई तरह की विषमताएं फैली हैं और हमें तलाश है एक बिलकुल अलग तरह की आजादी की। आजादी गरीबी, बेरोजगारी, मूलभूत सुविधाओं के अभाव और सामाजिक असमानताओं से। जब क्रांति की उस धारा के शहीदों को आज हम नमन करते हैं, तब 150 साल पहले के इतिहास के उन पन्नों से सबक लेना नहीं भूलना चाहिए।
(‘1857 का स्वातं˜य समर’ और ‘रोटी और कमल’ की कहानी से प्रेरित।)