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यहां रेशा-रेशा कुछ कहता है

इंदौर. यहां रेशा-रेशा उनके गांवों, उनकी पंरपराओं की कहानी कहता लगता लगता है। देश के कोने-कोने से आए कढ़ाई के कारीगरों की कारीगरी उन इलाकों की दास्तां बयां करती है। शुक्रवार को मालवा उत्सव के दूसरे दिन शाम ढलते ही फिर कलाप्रेमियों का जाजम जमा। खुशनुमा मौसम ने शिल्प मेले में और रंग भर दिया।

कारीगीरी पर झुर्रियों भरे चेहरे के पीछे कच्छ की पाली बाई और पामू के हाथों की छाप साफ दिखाई देती है। वे सिर से लेकर पांव तक पहने जाने वाली हर चीज पर कारीगीरी कर सकती हैं। चाहे वह कातड़ी (पारंपरिक चोली) हो या ईटोड़ी (सिर पर घड़ा रखने के लिए बनाई जाने वाली गठरी), काम इतना बारीक होता है कि एक-एक बूटा उकेरने में कई दिन लग जाते हैं।

बाड़मेर (राजस्थान) से आई धापुदेवी कांच कशीदे का काम करती हैं। जोधपुर की आरी कटार का काम भी यहां दिखा। पुष्कर का पैच वर्क लेकर आए नरेंद्र गुजराती कहते हैं हम खराब हो चुके कपड़ों को जोड़कर खूबसूरत बना देते हैं।

लखनऊ से आईं चिकन कारीगर वसीमा कहती हैं चिकन का काम पहले सिर्फ सफेद कपड़ों पर ही होता था। धीरे-धीरे रंगीन कपड़ों पर पसंद किया जाने लगा।

आज का कार्यक्रम :
शनिवार को प्रेस क्लब में सुबह 10 बजे मालवा के ऐतिहासिक सांस्कृतिक परिदृश्य पर लेखक और मालवा क्षेत्र के डॉ. भगवती पुरोहित का व्याख्यान।





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