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मांवां ठंडियां छांवां

मुंबईमां जैसे किसी छांह का नाम हो, जो जीवन की तपती धूप में मुझे राहत देती रही। सबको देती है, हमेशा।

तुमसे तुम्हारी मां चोट लगने पर क्या कहती हैं, मुझे नहीं मालूम, पर मेरी मां एक जादू करती थीं। जब भी मैं गिर पड़ती या कोई मेरा दिल दुखाता और मैं उदास हो जाती, तो मां आकर मुझे गोद में उठा लेतीं थीं। पलंग के किनारे या किसी कुर्सी पर मुझे आराम से बैठातीं और प्यार से मेरा हाथ अपने हाथ में लेतीं। मुस्कराकर मेरी तरफ देखतीं। उनकी उस प्यार-भरी मुस्कान से ही मेरा आधा दर्द दूर हो जाता था। पर मैं उदास बनी रहती, ताकि मां से सुकून मिलता रहे।

मेरा हाथ थामकर वे कहतीं - ‘दर्द हो रहा है, उदास है मेरी बेटी?’ और मैं Êाोर से सिर हिलाकर हां कहती। फिर वे कहतीं- ‘जब भी उदास हो, दुखी हो, तो मेरा हाथ थामना। मैं तुम्हें बताऊंगी कि मां तुमसे इतना प्यार करती है कि कोई दर्द तुम्हें परेशान कर ही नहीं सकता।’ और आंसुओं के बीच जैसे शांत बहती हवा जैसे ये शब्द मुझे Êिांदगी की सबसे बड़ी राहत देते थे। फिर मैं हाईस्कूल में आई, तो मां के शब्द प्यार-भरी नÊारों की भाषा में बदल गए। अब मेरी तकलीफों का कोई भी लम्हा, उनकी नÊारों से छलकते प्यार से ही आराम पा जाता था।

फिर मेरे कॉलेज के दिन आए और मुझे उनके साथ बिताने के लिए कम समय मिलने लगा। उन दिनों मां अचानक किसी भी रविवार को एक पिकनिक बास्केट तैयार कर लेतीं और कहतीं, ‘चलो मयूरी, आज कहीं घूमकर आते हैं।’ कभी-कभी तो वे मेरे दोस्तों को भी बुला लेतीं। उस दिन वे हमारे सारे दुख, सारी तकलीफें जैसे भांप लेती थीं और उनका साथ मरहम की तरह काम देता था। फिर मेरी शादी हो गई और अब मां के दुलार का तरीका कागÊा पर उतरने लगा। वे जब भी मेरे घर आतीं, जाते समय एक खत लिखकर जातीं। उनके सारे शब्द जाने कितना-कितना जादुई असर कर जाते थे।

फिर एक दिन पापा का फोन आया कि मां को पता नहीं क्या हो गया है, जल्दी आओ। दो घंटे की वह यात्रा मैंने कैसे की, मैं ही जानती हूं। जब घर पहुंची, तो मां बिस्तर पर लेटी थीं, आंख बंद किए। एक बार को मैं अपनी रुलाई नहीं रोक पाई। बस इतना ही पूछ सकी- मां कैसी हो? मां ने धीमे से मुस्करा के कहा- दर्द हो रहा है। और यादों को जैसे एक रेला-सा आ गया। मैंने तुरंत मां का हाथ थामा और कहा - ‘जब भी उदास हों, दुखी हों, तो मेरा हाथ थामिएगा। मैं बताऊंगी कि मयूरी आपसे इतना प्यार करती है कि कोई दर्द आपको परेशान कर ही नहीं सकता।’ मेरी आवाÊा में मां वाला शांत-ठहरा सा अहसास तो नहीं था, पर मां के तो इन शब्दों में ही जादू था। मां हौले-से मुस्करा दीं। उसके बाद अगले दो साल तक, मां की ओवेरियन कैंसर से हुई मृत्यु तक , ये शब्द मेरे बन गए। आज भी जब दिल दुखता है, मां का हाथ मेरे हाथों में आ जाता है और दर्द पता नहीं कहां गायब हो जाता है।





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