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Chandigarh Chandigarh चंडीगढअगर आप बार-बार अपनी जेब या पर्स टटोल कर मोबाइल फोन चेक करते हैं कि कहीं वह गुम तो नहीं हो गया। चाहे कॉल न आई हो, लेकिन आप अनलॉक कर यह चेक करते हैं कोई मिस कॉल तो नहीं। इतना ही नहीं आपको यह शक भी रहता है कि फोन में सिग्नल है या नहीं, या फिर बैटरी जाने वाली है। यह सारे लक्षण हैं नोमोफोबिया के।
नोमोफोबिया का शाब्दिक अर्थ है नो मोबाइल फोन, यानि एक ऐसा डर जो आपके दिमाग में ऐसे संकेत देता है कि आपका फोन या तो काम नहीं कर रहा या फिर खो गया है। यह एक तरह का भय है जो 50 फीसदी से अधिक लोगों को डराता रहता है। एक ऐसा तनाव जो दिमाग को शांत नहीं रहने देता। युवा नोमोफोबिया के सर्वाधिक शिकार हैं। इसकेअलावा सेल्स, मार्केटिंग, बीपीओज और मीडिया से जुड़े लोग अक्सर इस भय के शिकार हो जाते हैं।
बीपीओ में काम करने वाले रितेश ने बताया कि वह काम करते समय फोन अपने टेबल पर इसलिए रखते हैं कि कहीं जेब में पड़े पड़े कोई कॉल आए और पता न चले। टेबल पर होने के बाद भी रितेश बार-बार मोबाइल उठा कर उसे चेक करते हैं। पंजाब यूनिवर्सिटी के लॉ डिपार्टमेंट के स्टूडेंट विनोद शर्मा और रोहित अवस्थी ने बताया कि उनकी यह आदत हो गई है कि फोन को जब से निकाल कर देखना कि कहीं कोई कॉल या मेसेज तो नहीं आया। ऐसा नहीं है कि फोन साइलेंट मोड पर होता है, लेकिन उन्हें शक रहता है कि कहीं उन्हें काल सुनाई ही न दी हो। फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर रही रिदिमा साहनी ने बताया कि उन्हें नोमोफोबिया तो पता नहीं पर फोन गुम न हो जाए इसका डर रहता है।
अधिक फोन का इस्तेमाल करने वाले और लापरवाह लोगों को यह समस्या आती है। वहीं फोन गुम होने का भय इस तनाव को ओर बढ़ाता है।
—डॉ. विनीत गौतम, साइकोलॉजिस्ट