भोपाल. जिस कैंसर शब्द को सुनते ही लोगों की धड़कन बढ़ जाती हो, उस पर ही हिम्मत के साथ लड़ते हुए सैकड़ों मरीज विजय प्राप्त कर चुके हैं। ये व्यक्ति स्वस्थ होने के बाद अब दूसरे मरीजों को हिम्मत से इलाज कराने की प्रेरणा देने लगे हैं।
जवाहरलाल नेहरू कैंसर अस्पताल में ऐसे कई व्यक्ति आकर अन्य मरीजों की हौसला अफजाई करते हैं। अरेरा कालोनी की सुधा बंसल (62) कहती हैं कि ग्यारह वर्ष पहले ब्रेस्ट कैंसर की बात पता चलने पर लगा जैसे सबकुछ खत्म हो गया, लेकिन कैंसर अस्पताल में आपरेशन के बाद निकाली गई गठान की बायोप्सी कराने पर पता चला कि कैंसर प्रारंभिक अवस्था में ही था, जो दवाओं से पूरी तरह से ठीक हो गया। श्रीमती बंसल कहती हैं कि अब तो लगता है कि जैसे कभी कुछ हुआ ही नहीं था, इसलिए कैंसर से डरने की बजाय लड़ने से ही जीत संभव है।
ईदगाह हिल्स निवासी वरिंदर कौर (53) को भी चौदह वर्ष पहले ब्रेस्ट कैंसर की बात पता चलने पर लगा कि जैसे उनकी जिंदगी थम सी गई। अपने तीन बच्चों के भविष्य के बारे में सोचकर उनकी आंखों में रह-रहकर आंसू आ जाते थे। उनके पति ने उन्हें हौसला दिया और दिल्ली में आपरेशन कराया। फिर वर्ष 95 में कैंसर अस्पताल में करीब आठ माह तक कीमोथैरेपी कराई।
इलाज से ठीक हो चुकी श्रीमती कौर कहती हैं कि लोगों को अब समझ लेना चाहिए कि कैंसर ऐसी बीमारी है, जो ठीक हो सकती है। अब वे सप्ताह में एक दिन कैंसर अस्पताल जाकर मरीजों की हिम्मत बढ़ाने का काम करती हैं।
सागर में बेरखेड़ी गांव के किसान नारायण सिंह (69) को वर्ष 94 में गले का कैंसर होने पर कुछ भी खाने-पीने में तकलीफ होने के साथ ही उनकी आवाज भी बंद हो गई थी। लोगों से भी आए दिन कैंसर खतरनाक बीमारी होने की बात सुनते-सुनते उन्हें अपना अंतिम समय नजदीक ही नजर आने लगा था।
श्री सिंह कहते हैं उनकी 33 दिन तक कैंसर अस्पताल में सिकाई (रेडियोथैरेपी) होने के बाद धीरे-धीरे तबियत ठीक हो गई और करीब एक वर्ष के बाद वे बोलने भी लगे। इसी तरह शहडोल के एडवोकेट तेजराज द्विवेदी (81) को भी खाने की नली में चार वर्ष पहले कैंसर हो गया था। इससे खाने-पीने में उन्हें बहुत तकलीफ थी।
तीन माह तक कीमोथैरेपी-रेडियोथैरेपी कराने के बाद अब वे सामान्य जिंदगी बसर कर रहे हैं। नरसिंहपुर के ब्रजमोहन (65) को आठ वर्ष पहले बड़ी आंत में कैंसर हो गया था। वे भी आपरेशन के बाद कीमोथैरेपी, रेडियोथैरेपी लेने के बाद अब स्वस्थ हैं। दस वर्ष पूर्व ब्रेस्ट कैंसर का इलाज कराने के बाद ठीक हो चुकी रागिनी गुप्ता (परिवर्तित नाम) कहती हैं कि उन्हें कैंसर होने पर उनके पूरे परिवार का बहुत ज्यादा सहयोग रहा।
उनसे मिली हिम्मत-सहयोग के कारण ही वे कैंसर से जिंदगी की जंग जीत पाईं। जवाहरलाल नेहरू अस्पताल के रेडिएशन अंकोलाजी विभाग के अध्यक्ष डा. आरके पांडे कहते हैं कि कैंसर पर विजय पाने के लिए जरूरी है कि लोग इससे डरने की बजाय सामना करें। कैंसर से बचाव का मूलमंत्र है कि संदेह होने पर डरने या टालने की बजाय तत्काल जांच करा ली जाए, ताकि प्रारंभिक अवस्था में ही बीमारी का पता चल जाए, जो इलाज से ठीक करना संभव है।