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ग्वालियर भी है झरनों की नगरी

ग्वालियर.jharna जिन झरनों को देखने के लिए पर्यटक नैनीताल, मसूरी, दार्जिलिंग, अलहिलाल जाते हैं, वैसे ही झरने ग्वालियर की पर्वत श्रंखलाओं में भी हैं। अन्तर इतना है कि हिमालय के झरनों का प्रवाह तेज है, जबकि यहां के झरनों का प्रवाह धीमा है।

दरअसल ग्वालियर जिले में एक नहीं, दो नहीं बल्कि पूरे दस झरने ऐसे हैं, जिनमें बारह मास पानी बहता रहता है, लेकिन वन विभाग एवं स्थानीय लोगों की उपेक्षा के कारण प्रकृति की अमूल्य धरोहर अपने अस्तित्व के लिए निरंतर संघर्ष कर रही है।

जिले में कई वर्षो से अच्छी तरह से बरसात न होने के कारण झरनों का प्रवाह कम हो गया है। इसके बाद भी झरने अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं। बरसात के मौसम में तो सभी झरनों पर बड़ा मनोहारी दृश्य निर्मित हो जाता है।

क्यों कम हो रहा है झरनों का पानी : कभी ग्वालियर के आस पास कई झरने हुआ करते थे, लेकिन आज केवल दस झरने ही अपना अस्तित्व बचाकर रख पाए हैं। भूगर्भ शास्त्री डा. मधुमास खरे इसके लिए मानव द्वारा प्रकृति से की जा रही छेड़छाड़ को दोषी मानते हैं। वे बताते हैं कि यदि झरनों की अच्छी तरह से देखभाल की जाए तो झरनों को बचाया जा सकता है।

कैसे बचाए जाएं झरने : भूगोलविद कृष्णनारायण त्रिपाठी का मानना है कि झरनों के उद्गम स्थल वाले पर्वत के शिखर पर भूगर्भशास्त्रियों की सहायता से अवसादी चट्टानों की खोज की जाए और चयनित स्थानों पर परकोलेशन टैंक बनाए जाएं।

नलकेश्वर झरना का उदाहरण देते हुए श्री त्रिपाठी बताते हैं कि राजा मानसिंह ने बड़ी सूझ बूझ से झरना के उद्गम स्थल के ऊपर एक बड़े तालाब का निर्माण कराया था, जिससे न केवल पर्वत की अवसादी चट्टानों को हमेशा पानी मिलता था, बल्कि झरना का प्रवाह भी अच्छा रहता था।

ऐसा ही प्रयोग अन्य झरनों पर भी किया जा सकता है। भूगर्भशास्त्री डा. मधुमास खरे का मानना है कि अवसादी चट्टानों के चयन का दायित्व हाइड्रो जियोलॉजीकल सर्वे की टीम द्वारा कराया जाए। इसके साथ ही चयनित पहाड़ी पर ज्यादा से ज्यादा चैक डैम बनाए जाएं।

झरनों की अमूल्य धरोहर बचाने के सुझाव
हाइड्रो जियोलॉजीकल सर्वे की टीम द्वारा जिले भर की सभी अवसादी पहाड़ियों का सर्वे कराया जाए।
चयनित पहाड़ियों के स्लोप पर चैक डैम एवं शिखर पर परकोलेशन टैंक बनाए जाएं।
पहाड़ियों पर पौध रोपण किया जाए।
पहाड़ियों को संरक्षित किया जाए।
क्या कहते हैं अधिकारी
>> ग्वालियर में कुल 10 बारहमासी झरने हैं और सभी में पानी है, जिनमें बरसात में पानी का प्रवाह अधिक हो जाता है और गर्मियों में कम हो जाता है।
अजय तिवारी गैम रेंज ऑफिसर, सोनचिरैया अभयारण्य, घाटीगांव

>> ग्वालियर-चंबल रीजन विविधतापूर्ण क्षेत्र हैं। ग्वालियर में भी ऐसे झरने हैं, जिनमें बारहमास पानी रहता है। इस वर्ष बारहमासी झरनों में से तीन झरनों को वन्यजीवों के अनुकूल बनाया जाएगा, जहां वन्यजीव अपनी प्यास बुझा सकेंगे।
आरबी सिन्हा, सीएफ, वन विभाग

प्रेम का प्रतीक नलकेश्वर झरना
अपनी प्रेयसी और पत्नी मृगनयनी की फरमाइश पर महाराजा मानसिंह ने तिघरा बांध के समीप स्थित नलकेश्वर से गूजरी महल तक पानी की पाइप लाइन बिछवाई थी। पुरातत्ववेत्ता एलबी सिंह का मानना है कि मृगनयनी नलकेश्वर का ही पानी पीती थी।

ग्वालियर के बारहमासी झरने
1. सिद्ध बाबा का झरना ,ग्राम गोठपुरा के पास
2. हुनपुरा का झरना, ग्राम हुनपुरा
3. मूंसा की झिरिया
4. छिकारी खो का झरना
5. करइया झरना
6. नलकेश्वर झरना
7. देवखो झरना
8.कांसेर नर झिर (झिरना), ग्राम रायपुर
9.रायका आश्रम झरना, ग्राम डूडापुरा के पास
10. नृपतपुरा कुण्ड झरना, नृपतपुरा ग्राम के पास





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